(धर्मपथ)- नागा समझौते को लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ है ,शुरू से इस समझौते के तरीके और उसके आशय पर उंगलियाँ उठती रही हैं .सरकार ने इस समझौते की शर्तों को गुप्त रखा और बखेड़े को हवा दी .अब बवाल मचने पर समझौते की शर्तों को सार्वजनिक मंच पर रखने की बजाय भाजपा का वह धडा जो सोशल मीडिया में सक्रीय रहता है के माध्यम से इस प्रचार के विरोध में तथ्य रखवाए जा रहे हैं.लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस मसले पर जिसमें प्रधानमन्त्री ने स्वयं श्रेय लेते हुए राष्ट्र के समक्ष इसकी प्रस्तुति दी थी उसी प्रकार इस समझौते की शर्तों के सम्बन्ध में बयान देने से बच रहे हैं.उनका यह तरीका शंका-कुशंका को और हवा दे रहा है.जो आरोप लगाए जा रहे हैं उनके उत्तर में शर्तों को सार्वजनिक करना और प्रधानमन्त्री जी का बयान देना इसका सहज समाधान है .राज्यमंत्री रिजीजू द्वारा बयान देना काफी नहीं है .जिस मुद्दे को प्रधानमन्त्री ने अपना श्रेय लेते हुए विश्व पटल पर रखा उसका उत्तर देना उनका नैतिक कर्तव्य हो जाता है.
मोदी सरकार की तरफ से नागा संगठनों के लिए मध्यस्थ चुना गया ज्वाइंट इंटेलीजेंस कमेटी के चीफ, आर एन रवि को. केरल कैडर के सीनियर आईपीएस , रवि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार( एनएसए) अजित डोवाल के खासोमखास माने जाते हैं. आर एन रवि ने खुद नागालैंड और मणिपुर में पीएमओ राज्यमंत्री जीतेन्द्र सिंह के साथ मिलकर नागा संगठनों से बातचीत की, तब जाकर ये शांति समझौता हुआ है.
लेकिन इस समझौते में एनएससीएन का वो धड़ा शामिल नहीं है जिसने 4 जून को भारतीय सेना के काफिले पर हमला कर 18 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था. ऐसे में इस बात की भी आंशका जताई जा रही है कि इस समझौते के बाद एनएससीएन का खापलांग ग्रुप एक बार फिर से अपनी हिंसक गतिविधियां तेज ना कर दे. लेकिन सूत्रों की मानें तो सरकार ने सेना और दूसरे सुरक्षा-बलों को खापलांग ग्रुप के खिलाफ ऑपरेशन तेज करने का आदेश दिया है. सोमवार को जब ये समझौता हो रहा था तब सेना खापलांग ग्रुप के उग्रवादी को गिरफ्तार कर रही थी.
हालांकि सरकार ने इस समझौते को ऐतिहासिक करार दिया है और इससे देश में सबसे पुरानी हिंसक समस्या सुलझने के आसार दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सरकार ने इस समझौते की शर्तों को सार्वजनिक नहीं किया है.
प्रधानमंत्री ऑफिस द्वारा जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि ” इससे पूर्वोत्तर क्षेत्र में शांति स्थापित होगी और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा. इससे उनका जीवन सम्मानित होगा और नगाओं की बेजोड़ मेधाविता तथा उनकी संस्कृति और परंपराओ के आधार पर उन्हें समान अवसर और समानता आधारित आजीविका मिलेगी.”
सूत्रों के अनुसार समझौता कुछ इस प्रकार है ,
1. एनएससीएन को ग्रेटर-नागालिम की मांग को छोड़ना होगा. नागा ग्रुप की मांग थी कि नागालैंड और मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम और म्यांमार के कुछ इलाकों को मिलाकर ग्रेटर-नागालिम बनाया जाए. ये इलाका नागा बहुल इलाका होगा और नागाओं की सरकार भी होगी.
2. एनएससीएन (आईएम) ग्रुप को अपने सभी हथियार और गोला-बारुद सरकार को सरेंडर करना होगा-हालांकि जब 1997 में एनएससीएन के साथ युद्धविराम संधि हुई थी, तब से ही एनएससीएन के सदस्यों पर पुलिस और दूसरे सुरक्षाबलों की नजर रहती है और कैंपो पर सुरक्षा-बलों की तैनाती रहती है.
3. एनएससीएन के सदस्य किसी भी तरह से नागालैंड और दूसरे उत्तर-पूर्व के राज्यों में उगाही, अपहरण या स्थानीय लोगों को किसी भी तरह से प्रताड़ित नहीं करेंगे.
4. हिंसा त्यागने और अपने हथियार सरेंडर करने के एवज में एनएससीएन के सभी सदस्य मुख्य-धारा में शामिल हो जाएंगे. इसके लिए सरकार उनकी पुर्नवास योजना लेकर आएगी. साथ ही सभी सदस्यों को रोजगार भी दिया जायेगा. जरुरी हुआ तो उन्हे पुलिस या फिर अद्धसैनिक बलों में नौकरी दी जायेगी.
5. क्या सरकार एनएसीएन के सदस्यों को किसी तरह का राजनैतिक संरक्षण या आरक्षण देगी इस पर सस्पेंस बरकरार है. साथ ही किस तरह इस समझौते से सांस्कृतिक विस्तार होगा इसके बारे में भी अभी खुलासा होने बाकी है.
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