अदालतों को पंच फैसलों के प्रति सम्मान दिखाना चाहिए : ठाकुर

नई दिल्ली, 23 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत के प्रधान न्यायाधीश(सीजेआई) टी.एस. ठाकुर ने रविवार को यह स्वीकार किया कि भारत में यह आम धारणा है कि अदालतें मध्यस्थता की प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप करती हैं। उन्होंने कहा कि अदालतों को पंच निर्णय के प्रति सम्मान दिखाना चाहिए।

ठाकुर नीति आयोग द्वारा भारतीय पंच निर्णय की व्यवस्था को मजबूत करने और उन्हें लागू करने की दिशा में राष्ट्रीय पहल विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में अध्यक्षीय भाषण कर रहे थे।

ठाकुर ने कहा कि पिछले दो दिनों से एक बहुत प्रभावी राय बनी है, भारत में अदालतें पंच निर्णयों में अनावश्यक हस्तक्षेप करती हैं। यह आलोचना पूरी तरह अनुपयुक्त नहीं है।

उन्होंने कहा कि अदालतों को पंच निर्णयों के प्रति सम्मान का भाव दिखाने के लेकर संवेदनशीलता दिखाने की जरूरत है। उन निर्णयों को दरकिनार कर देने की जगह उन्हें बरकरार रखने के प्रति न्यायिक संवेदनशीलता दिखाना बहुत जरूरी पहलू है जिसका निवारण करने की जरूरत है।

प्रधान न्यायाधीश ने ऐसे कानूनी ढांचे पर जोर दिया जिससे अदालतों में पंच निर्णयों के लंबे समय तक लटकना कम हो सके।

उन्होंने कहा कि वास्तविक परेशानी तब शुरू होती है जब फैसलों को अदालत में चुनौती दी जाती है और एक बार जब मामला कानूनी चक्की में चला आता है तो यह अदालतों में निरंतर पड़ा रहता है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि सिंगापुर को पंच निर्णय का लोकप्रिय केंद्र है क्योंकि वहां कानूनी व्यवस्था है जिससे उसे पंच निर्णय के लिए पसंदीदा देश माना जाता है।

उन्होंने महाकाव्य महाभारत से भगवान श्रीकृष्ण का उदाहरण दिया जिन्होंने पांडवों की ओर से कौरवों के साथ मध्यस्थता की थी। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता, पंच निर्णय और समझौता से हमारा लोकाचार ओतप्रोत है।

सीजेआई ने कहा कि इसके बावजूद भारत में मात्र एक संस्था है जो पंच निर्णय का प्रस्ताव देती है जबकि चीन में ऐसे 300 से भी अधिक संस्थाएं हैं।

उन्होंने भारत में मध्यस्थता के लिए विश्वसनीय संस्थान स्थापित करने की जरूरत पर बल दिया।

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