भोपाल, 18 मई (आईएएनएस)। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे की पहचान एक राजनेता से कहीं ज्यादा पर्यावरण हितैषी और रक्षक की रही है। नदियों के संरक्षण के बड़े पैरोकार दवे ने अपनी वसीयत में भी पेड़ लगाने का आह्वान किया है।
भोपाल, 18 मई (आईएएनएस)। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे की पहचान एक राजनेता से कहीं ज्यादा पर्यावरण हितैषी और रक्षक की रही है। नदियों के संरक्षण के बड़े पैरोकार दवे ने अपनी वसीयत में भी पेड़ लगाने का आह्वान किया है।
अनिल दवे मूल रूप से उज्जैन जिले के बड़नगर के निवासी थे, जहां उनका जन्म छह जुलाई 1956 को हुआ था। उनकी परवरिश ऐसे परिवार में हुई, जिसका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से करीबी नाता रहा है। उन्होंने इंदौर के गुजराती महाविद्यालय से एम.कॉम. किया। वह कॉलेज के समय से ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे। जे.पी.आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।
दवे लंबे अरसे तक संघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संगठन के लिए काम करते रहे। वह एक कुशल संगठक व रणनीतिकार भी माने गए। इतना ही नहीं, विधानसभा चुनाव प्रबंधन की कमान भी पिछले तीन चुनाव से उनके हाथों में ही रही। उनकी कुशल रणनीति का ही नतीजा था कि सभी चुनाव में भाजपा को जीत मिली।
दवे पहली बार सक्रिय राजनीति में तब आए, जब 2009 में उन्हें राज्यसभा के लिए पार्टी ने उम्मीदवार बनाया और 2015 में मोदी सरकार के अहम विभाग पर्यावरण की जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रधानमंत्री से दवे की काफी नजदीकियां रही हैं। मोदी जब मध्य प्रदेश के प्रभारी बनकर आए थे, तब दवे और मोदी के बीच का सामंजस्य काफी क्रियाशील था।
दवे ने नर्मदा नदी के संरक्षण को लेकर काफी काम किया। वह एक गैर सरकारी संगठन नर्मदा समग्र से जुड़े रहे। वह हिंदी और अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे और दोनों ही भाषाओं में पुस्तकें लिखी हैं। इतना ही नहीं, वह होशंगाबाद जिले के बांद्राभान में नदी महोत्सव का भी आयोजन करते रहे। उन्हें नदियों से कितना लगाव था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके आवास के बाहर ‘नदी का घर’ लिखा हुआ है।
दवे नदी और पर्यावरण के कितने बड़े हितैषी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी जो वसीयत (सोशल मीडिया पर वायरल) छोड़ी है, उसमें साफ तौर पर लिखा है कि पेड़ लगाएंगे तो मुझे आनंद मिलेगा। उन्होंने 23 जुलाई, 2012 को जो वसीयत (विल) लिखी है, उसमें कहा गया है, ‘संभव हो तो मेरा दाह संस्कार बांद्राभान में नदी महोत्सव वाले स्थान पर किया जाए। उत्तर क्रिया के रूप में केवल वैदिक कर्म ही हों, किसी भी प्रकार का दिखावा न किया जाए।’
आगे लिखा है, ‘मेरी स्मृति में कोई भी स्मारक, प्रतियोगिता, पुरस्कार, प्रशिक्षण इत्यादि का आयोजन न किया जाए। जो मेरी स्मृति में कुछ करना चाहते हैं, वे कृपया वृक्ष लगाने और उनकी रक्षा करने का कार्य करेंगे तो मुझे आनंद होगा। वैसे भी नदी-जलाशयों के संरक्षण में अपनी सामथ्र्य अनुसार अधिकतम सहयोग भी प्रदान किए जा सकते हैं, ऐसा करते हुए भी मेरे नाम के प्रयोग से बचेंगे।’
दवे के नर्मदा प्रेम को इस बात से भी समझा जा सकता है कि वह स्वयं नौ मई को नर्मदा सेवा यात्रा में शामिल हुए थे और उन्होंने 15 मई को अमरकंटक में आयोजित समारोह के प्रधानमंत्री के सात ट्वीट को री-ट्वीट किया था। उसके बाद से उन्होंने कोई ट्वीट नहीं किया।
दवे की पहचान उन विरले राजनेताओं में रही है, जिनके अंदर मीडिया या यूं कहें कि प्रचार की भूख कभी नहीं रही। वह भोपाल कब आए और कब चले गए, इस बात का मीडिया तो क्या उनके आवास के आस-पास रहने वालों को भी पता नहीं चलता था।
एक तरफ पर्यावरणविद और रक्षक का दुनिया से जाने से जहां राजनीतिक जगत और पर्यावरण हितैषी दुखी है, वहीं उनकी वसीयत ने आम लोगों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी है।
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