नई दिल्ली, 12 मार्च (आईएएनएस)। अपरंपरागत मौद्रिक नीति का लाभ कम होता जा रहा है, जबकि उसे लागू करने की कीमत महंगी पड़ रही है। आरबीआई (भारतीय रिजर्व बैंक) के गर्वनर रघुराम राजन ने शनिवार को यह कहा।
उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और भारत सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित सम्मेलन ‘एडवांसिंग एशिया : इनवेस्टिंग फॉर फ्यूचर’ में कहा, “अपांरपरिक मौद्रिक नीति के घरेलू अर्थव्यवस्था पर असर के बारे में कोई फैसला सुनाना मुश्किल है। लेकिन यह कहना सही होगा कि इसके फायदे वर्षो की मेहनत के बावजूद घटते जा रहे हैं और लागत बढ़ती जा रही है।”
उन्होंने कहा कि अगर धीमी वृद्धि दर का मुख्य कारण संरचनात्मक अवरोध है तो प्रश्न यह है कि क्या अपरंपरागत मौद्रिक नीति से राजनीतिज्ञों पर से जरूरी नीतिगत कार्यो को शुरू करने का दबाव कम हो जाता है।
आरबीआई के गर्वनर ने कहा कि औद्योगिक देशों के केंद्रीय बैंकों के गर्वनर यह जानते हैं कि केवल मौद्रिक नीति संरचनात्मक सुधारों का विकल्प नहीं हो सकता और न ही इससे विकास की क्षमता बढ़ती है।
मौद्रिक नीति की लक्षित जगह की बजाय दूसरी जगहों पर होने वाले फायदों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अगर मौद्रिक नीति का फायदा लक्षित जगह की बजाय अन्य को भी होता भी है तो वैश्विक समुदाय को उसकी रेटिंग ‘हरी’ रखनी चाहिए।
जिन नीतियों को अस्थायी तौर पर सावधानी के साथ लागू किया जाता है उसे ‘नारंगी’ रेटिंग देनी चाहिए, लेकिन जिन नीतियों से हमेशा बचने की जरूरत है उसे ‘लाल’ रेटिंग देनी चाहिए।
इन रेटिंगों को स्थापित करने और नीति पर उसका असर देखने के लिए किसी खास निर्धारित वक्त की बजाय उसे समयानुसार देखना चाहिए।
राजन ने कहा, “अगर नीतियों का देश और देश से बाहर वैश्विक समुदाय के लिए सही असर होता है को उसे निश्चित रूप से ‘हरी’ रेटिंग देनी चाहिए। परंपरागत मौद्रिक नीतियां सामान्यत: इसी श्रेणी की होती है। इससे घरेलू अर्थव्यवस्था में उत्पादन बढ़ता है तो विदेशों में भी मांग में तेजी आती है।”
उन्होंने कहा, “ऐसी नीतियों को ‘हरी’ रेटिंग देनी चाहिए। हालांकि यह मानते हुए कि देश और विदेश की अर्थव्यवस्था में वित्तीय और क्रेडिट चक्र के चरण में कम ब्याज दरों से होनेवाली वित्तीय स्थिरता सीमित होने की संभावना है।”
मौद्रिक नीतियों के बिखरे असर को मापने और विश्लेषित करने के मुद्दे पर राजन ने कहा कि इसके लिए एक उचित फोरम की जरूरत है जिसनें प्रसिद्ध शिक्षाविदों के समूह के साथ दुनियाभर देशों के प्रतिनिधि होने चाहिए, ताकि वे मौद्रिक नीति के लक्षित क्षेत्रों से परे होनेवाले लाभ का विश्लेषण कर सकें और उसकी रेटिंग तय कर सकें।
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