अभिनय की अपेक्षा निर्देशन अधिक संतुष्टिप्रद : राहुल बोस

मुंबई, 1 मार्च (आईएएनएस)। अपने यथार्थपरक अभिनय के लिए विख्यात राहुल बोस का मानना है कि अभिनय की अपेक्षा निर्देशन कहीं अधिक संतुष्टि प्रदान करने वाला है।

मुंबई, 1 मार्च (आईएएनएस)। अपने यथार्थपरक अभिनय के लिए विख्यात राहुल बोस का मानना है कि अभिनय की अपेक्षा निर्देशन कहीं अधिक संतुष्टि प्रदान करने वाला है।

राहुल हाल ही में 16 वर्षो के लंबे अंतराल के बाद अपनी आगामी फिल्म ‘पूर्णा’ के जरिए निर्देशन के क्षेत्र में वापसी करने जा रहे हैं। इससे पहले राहुल बतौर निर्देशक ‘एवरीबडी सेज आई एम फाइन’ के लिए फिल्म जगत की सराहना हासिल कर चुके हैं।

यह पूछे जाने पर कि निर्देशन में लौटने के पीछे क्या प्रेरणा रही, राहुल ने कहा, “जब मैंने अपनी पहली फिल्म निर्देशित की थी, तब से ही मुझे पता था कि एक दिन मैं निर्देशन के क्षेत्र में लौटूंगा। मैंने तभी कहा था और मेरा अब भी यह कहना है कि कुछ खास वजहों से अभिनय की अपेक्षा निर्देशन अधिक संतुष्टि देने वाला है। पहला कारण तो यही है कि निर्देशन में कहानी आपकी होती है। 2014 तक मुझे अभिनय के ढेरों मौके मिलते रहे, लेकिन 2015 में अच्छे अभिनय की पेशकश कम हो गई। इसलिए मैंने निर्देशन में वापसी का फैसला किया। और अब मैं ‘पूर्णा’ के साथ निर्देशन में वापसी को तैयार हूं।”

अभिनय छोड़कर ‘पूर्णा’ बनाने के फैसले पर उन्होंने कहा, “मुझे तेलंगाना के आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण कुमार का चरित्र निभाने का प्रस्ताव मिला था। मुझे फिल्म की कहानी इतनी पसंद आई कि मैंने इसके निर्माण की पेशकश कर डाली और चार महीनों के अंदर पैसों का इंतजाम कर लिया। अंतत: मैंने इसे निर्देशित करने का फैसला किया।”

फिल्म की प्रमुख पात्र पूर्णा के किरदार के लिए अभिनेत्री की तलाश के बारे में उन्होंने कहा, “पूर्णा के किरदार के लिए अभिनेत्री की तलाश बेहद कठिन रही। जब लोग फिल्म देखेंगे तो उन्हें अहसास होगा कि पूरी फिल्म उन्हीं के कंधों पर चलती है। मैं शुरू से इस बात को लेकर स्पष्ट था। अभिनेता या अभिनेत्री और पवर्तारोही के बीच चयन की बात हो तो मैं हमेशा अभिनेता या अभिनेत्री का चयन करूंगा।”

उन्होंने कहा, “हमने पूर्णा का किरदार निभाने के लिए तेलंगाना के समाज कल्याण स्कूलों की 500 लड़कियों का ऑडिशन लिया। उनमें से हमने 109 लड़कियों को शॉर्टलिस्ट किया। उनमें से कुछ बेहद प्रतिभावान थीं, लेकिन ऐसा कोई नहीं था, जिसमें संवेदनशीलता, सहजबोध, दबाव को झेलने की क्षमता और भावनात्मक ज्ञान सबकुछ एकसाथ हो, जिसकी मुझे तलाश थी। तब तक मेरे कास्टिंग डायरेक्टर मयंक और उनके सहायक बुरी तरह थक चुके थे। आखिरकार हमें 110वीं लड़की में यह सब मिला।”

उन्होंने पूर्णा का किरदार निभाने वाली अदिति इनामदार की प्रशंसा करते हुए कहा, “उनका अभिनय बेहद स्वाभाविक है, जैसा कि शबाना आजमी, तब्बू और कोंकणा सेन शर्मा करती हैं। वह बहुत संकोची स्वभाव की हैं, लेकिन भावों को व्यक्त करने की उनका क्षमता, समझने की काबिलियत और मानव के जटिल स्वभाव को महसूस करने और उसे अपने अभिनय के जरिए अभिव्यक्त करने की क्षमता जबरदस्त है।”

पवर्तारोहण पर सिनेमा को अधिक ध्यान देने के बारे में राहुल ने कहा, “मैं खुद हिमालय क्षेत्र का हूं। हमारा 1947 से एक घर कसौली में है और मैं हिमालय क्षेत्र में पला-बढ़ा। मैंने 17,000 फुट ऊंचाई तक पर्वातरोहण किया है, उत्तरकाशी, सिक्किम, कसौली के आस-पास की पहाड़ियों की यात्रा की है।”

टीवी स्क्रीन पर कम ही दिखाई देने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “साधारण सी बात है। पिछले चार वर्षो के दौरान मेरा अभिनय करियर धीमा पड़ा है। इसके पीछे तीन मुख्य वजहें हैं- मेरी उम्र, नए अभिनेताओं का आना और फिल्म जगत का ग्रामीण और गरीब उन्मुख होना, जिसके लिए मुझे उपयुक्त नहीं माना जाता। निश्चित तौर पर लोगों ने मेरी फिल्म ‘द जैपनीज वाइफ’ नहीं देखी होगी।”

उन्होंने कहा, “करियर के इस पड़ाव पर अब मैं चाहता हूं कि जो भी छोटा से छोटा किरदार करूं, उसका चरित्र बड़ा हो, महत्वपूर्ण हो और मुझे पूरी आजादी मिले। ऐसा नहीं है तो मुझे उसे करने में कोई रुचि नहीं है।”

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