ओवैसी आकर चले गए, लेकिन उनके जाने के बाद जिले का सियासी पारा और गरम हो गया है। यह सबसे बड़ी सियासी जनचर्चा का मुद्दा बना हुआ है।
दरअसल, ओवैसी के दौरे के वक्त न तो कहीं जनसभा थी, न उसका कोई प्रचार-प्रसार। फिर भी वह जहां भी कुछ पल के लिए रुके वहां हजारों की भीड़ जमा हो गई। भीड़ का 90 फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यक युवाओं का था।
तमाम युवाओं से बातचीत में सरकार के प्रति उनकी नाराजगी भी सामने आई। इनमें से कई ऐसे हैं जो समाजवादी पार्टी के वोटर रहे हैं।
इटवा में नौजवान अख्तर आलम का कहना था कि अखिलेश सरकार से उन्हें बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन वह वादे पर खरी नहीं उतरी। एम. अफजल, बैतुल्लाह खान आदि युवाओं का कहना था कि सपा ने वादा करके आरक्षण नहीं दिया। मुसलमानों के लिए नौकरी के इंतजामात नहीं किए गए। उलटे चार साल में उन पर कई दंगों के दाग जरूर लगे हैं। ऐसे में अब उनकी उम्मीदें एआईएमआईएम पर लग गई हैं।
जिले में कुल 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी है जो आम तौर से सपा का समर्थक रहा है, लेकिन ओवैसी के ताजा कार्यक्रम से लगा कि आने वाले चुनाव में अल्पसंख्यकों का खासा वोट एआईएमआईएम की ओर मुड़ सकता है।
अगर ऐसा हुआ तो इसका नुकसान सपा को उठाना पड़ सकता है। उधर, इस बारे में सपा नेता खुरशीद खान का कहना है कि ओवैसी जिले में बेअसर रहेंगे, लेकिन जितने भी वोट काटेंगे, वे सपा के ही कटेंगे।
उनका कहना है कि पहली मई से प्रदेश भर में सपा की साइकिल रैली निकल रही है। सपाई गांव-गांव पहुंचकर लोगों को सपा सरकार की नीतियां बताएंगे। उन्हें उम्मीद है कि मुस्लिम समाज न केवल सपा की नीतियों को समझेगा, बल्कि उसे वोट भी करेगा।
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