उप्र चुनाव में सपा, बसपा, कांग्रेस की नजर अल्पसंख्यकों पर

भाजपा जहां दलितों, पिछड़ों व सवर्णों का त्रिकोण बनाकर बाजी मारने की फिराक में है तो चाहे बसपा हो सपा या कांग्रेस, तीनों अल्पसंख्यकों का सहारा पाने को आतुर नजर आ रही हैं।

उत्तर प्रदेश में जनगणना-2001 के जातियों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछड़ों की संख्या सर्वाधिक है। पिछड़े वर्ग के 45 फीसदी मतदाता हैं। दलित 20 से 21 फीसदी, अल्पंख्यक 19 फीसदी और ब्राह्मण 13 फीसदी हैं।

समाजवादी पार्टी प्रदेश की सत्ता में जब भी आई उसे अल्पसंख्यकों व पिछड़ों का साथ मिला। सपा ने इसीलिए हमेशा अल्पसंख्यक वर्ग के नेताओं को टिकट देने में कभी कोई कोताही नहीं की।

सपा उनके सहारे मुस्लिम मतों की दावेदारी मजबूती से बनाए रखना चाहती है। 21 जिलों में मुस्लिम मत की संख्या 19 प्रतिशत तक है। इनकी सर्वाधिक संख्या रामपुर में 50.57 प्रतिशत से ऊपर है। इसके बाद बिजनौर, ज्योतिबा फुले नगर, मुरादाबाद, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर व बलरामपुर में इनकी आबादी 37 से 47 प्रतिशत तक है।

मेरठ, बहराइच, श्रवस्ती, सिद्धार्थनगर, बागपत, गाजियाबाद और लखनऊ में भी काफी मुस्लिम हैं।

बात कांग्रेस की हो तो उसके रणनीतिकार इसको ध्यान में रखकर गुणा-गणित बैठा रहे हैं। कांग्रेस ने इसको ही ध्यान में रखकर पहले यूपी का प्रभारी गुलाम नबी आजाद को बनाया, फिर प्रदेश संगठन में अल्पसंख्यकों को अहम जिम्मेदारी दी गई। इससे कांग्रेस की रणनीति का काफी कुछ संकेत दिखाई पड़ रहा है।

बसपा का आधार वोट बैंक दलित हैं, लेकिन वह भी अल्पसंख्यकों को सहारा पाने को आतुर दिखाई दे रही है। बसपा ने अपने कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी को इस बार फिर मुस्लिम समाज को अपने साथ करने की जिम्मेदारी दी है। बसपा उनके जरिए खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगातार बैठकें कर रही है।

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