उन्होंने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) का नाम राष्ट्रीय सामाजिक शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीएसईबीसी) किए जाने और ओबीसी में किसी जाति को जोड़ने व घटाने के लिए संसद को अधिकार दिए जाने के पीछे आरएसएस की साजिश बताया।
उन्होंने कहा कि ओबीसी आरक्षण समीक्षा के नाम पर पिछड़े वर्ग के आरक्षण पर आरएसएस का चाबुक लगना तय है।
निषाद ने कहा, “मंडल कमीशन की रिपोर्ट सौपें जाते वक्त ओबीसी की देश में 52 प्रतिशत आबादी थी, लेकिन इन्हें मात्र 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया जो नैसर्गिक न्याय के प्रतिकूल है। दूसरी तरफ अनुसूचित जाति व जनजाति को उनकी जनसंख्या के बराबर आरक्षण की व्यवस्था है।”
उन्होंने कहा, “वर्ष 1999 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने राजनीतिक व आर्थिक रूप से ताकतवर जाट, कम्मा, लिंगायत, बोक्कालिगा आदि को ओबीसी में शामिल कर पिछड़ों का हिस्सा मारा और 1 जनवरी, 2002 को मोदी ने अपनी जाति ‘मोढ़ घाची’ को ओबीसी में शामिल कर लिया। इस समय पिछड़ों की आबादी 60 प्रतिशत से अधिक हो गई है।”
उन्होंने अनुसूचित जाति/जनजाति की भांति ओबीसी को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने, ओबीसी की जनणना रिपोर्ट घोषित करने तथा न्यायाधीशों की नियुक्ति में कोलोजियम व्यवस्था खत्म कर दो या तीन स्तरीय ‘क्वालिफाइंग टेस्ट’ शुरू करने की मांग की है।
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