कांग्रेस मणिपुर के विधेयकों में केंद्रीय दखल के खिलाफ

इंफाल, 12 जनवरी (आईएएनएस)। कांग्रेस विधायक आर.के.आनंद ने मंगलवार को मणिपुर में इनर लाइन परमिट (आईएलपी) लागू करने से संबंधित तीन लंबित विधेयकों पर बातचीत में केंद्र के प्रतिनिधियों की भागीदारी का विरोध करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया है।

इस मामले में मुख्यमंत्री के करीबी मददगार आनंद आईएलपी के लिए अभियान चलाने वालों से लंबी बातचीत में लगे हुए हैं।

आनंद ने कहा कि मणिपुर में गैर मणिपुरियों के प्रवेश और रहने के नियमों से संबंधित इन विधेयकों को 31 अगस्त को राज्य विधानसभा ने पारित किया था। राज्य के विधायकों और सांसदों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद इसे पारित किया गया था।

राज्य के मुख्यमंत्री ओकरम इबोबी के विचारों को ही एक तरह से दोहराते हुए आनंद ने कहा, “अगर अब इन विधेयकों पर केंद्रीय प्रतिनिधियों की निगरानी में चर्चा होगी तो इससे गलत संदेश जाएगा और यह अस्वीकार्य है।”

आईएलपी विरोधी अभियान में चूड़ाचंद्रपुर जिले में नौ आदिवासी युवकों की मौत हुई थी। आज भी इनके शव शवगृह में रखे हुए हैं। आंदोलनकारियों ने शव लिए बिना इनकी प्रतीकात्मक अंत्येष्टि की। उनका कहना है कि शव तभी लिए जाएंगे, जब ‘आदिवासी विरोधी विधेयक वापस लिए जाएंगे।’

मणिपुर विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित इन विधेयकों को राज्यपाल ने राष्ट्रपति के पास भेजा है, क्योंकि इनमें कई गंभीर मुद्दे फंसे हुए हैं।

आनंद ने कहा, “मणिपुर में गैर आदिवासियों को कोई संवैधानिक संरक्षण नहीं मिला हुआ है और ये राज्य में लुप्त होने के कगार पर हैं।”

आईएलपी प्रणाली पर गठित संयुक्त समिति के संयोजक रतन खोमदरम ने कहा कि आईएलपी के अगले चरण के अभियान की शुरुआत जल्द होगी। तीनों विधेयकों पर सहमति की अंतिम समयसीमा तीन जनवरी तय की गई थी। राज्य में भूकंप की वजह से अभियान की शुरुआत नहीं हो सकी।

अधिकारियों का कहना है कि आईएलपी समर्थक और विरोधी समूहों के बीच कोई सहमति नहीं बनी है। डर इस बात का है कि अगर ‘आदिवासी विरोधी विधेयकों’ को सहमति दे दी गई तो फिर राज्य में सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है।

बीते महीने आदिवासी नेताओं से मुलाकात में मुख्यमंत्री ने कहा था कि मामले को बातचीत से सुलझाया जाएगा। उन्होंने कहा था कि विधेयक आदिवासी विरोधी नहीं हैं। जो मुद्दे हैं, उन पर विचार किया जा सकता है।

आदिवासियों का कहना है कि विधेयक वापस लिए जाएं। गैर आदिवासियों का कहना है कि इन पर बिना देर किए सहमति दी जाए।

इन तमाम महीनों में केंद्र इस मामले से दूरी बनाए रहा। इस प्रस्ताव पर भी टिप्पणी नहीं की गई है कि वार्ता में केंद्र की भी भागीदारी हो।

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