नई दिल्ली, 25 अप्रैल (आईएएनएस)। ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करने वाली भारत की पहली महिला जिमनास्ट बनने वाली दीपा करमाकर का कहना है कि वह अपने कोच बिस्बेश्वर नंदी और पिता दुलाल करमाकर के समर्थन और सहयोग की बदौलत इस मुकाम पर पहुंची हैं।
नई दिल्ली, 25 अप्रैल (आईएएनएस)। ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करने वाली भारत की पहली महिला जिमनास्ट बनने वाली दीपा करमाकर का कहना है कि वह अपने कोच बिस्बेश्वर नंदी और पिता दुलाल करमाकर के समर्थन और सहयोग की बदौलत इस मुकाम पर पहुंची हैं।
त्रिपुरा निवासी दीपा ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करने वाली देश की पहली महिला जिम्नास्टिक खिलाड़ी हैं। उन्होंने ब्राजील में हुए टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक हासिल कर इस साल अगस्त में रियो डी जेनेरियो में होने वाले ओलम्पिक खेलों के लिए क्वालीफाई किया है। दीपा का ओलम्पिक टेस्ट इवेंट में स्वर्ण जीतना भी एक नया कीर्तिमान है।
जिमनास्टिक दीपा की पहली पसंद नहीं थी। उनके पिता और इम्फाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) केंद्र में भारोत्तोलन कोच दुलाल करमाकर ने उन्हें इस ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
आईएएनएस के साथ ई-मेल के जरिए साक्षात्कार में दीपा से जब इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “छह वर्ष की उम्र में मैंने जब जिमनास्टिक में पहली बार कदम रखा था, तब मुझे इसमें बिलकुल भी रुचि नहीं थी, लेकिन मेरे पापा ने मुझे इसमें हिस्सा लेने की प्रोत्साहित किया।”
दुलाल का कहना था कि वह अपनी दो बेटियों में से किसी एक को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ाना चाहते थे और इसलिए उन्होंने दीपा को इस ओर प्रेरित किया।
रियो ओलम्पिक में क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट की उपलब्धि हासिल करने के बाद मन में सबसे पहले आए ख्याल के बारे में दीपा ने कहा कि उन्हें इस बात से काफी खुशी हुई कि उन्होंने जो चाहा वह हासिल कर लिया।
दिल्ली में 2010 में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में वह भारतीय जिमनास्टिक टीम का हिस्सा भी थीं, जहां उन्होंने आशीष कुमार को जिमनास्टिक में भारत का पहला पदक जीतकर इतिहास रचते देखा।
आशीष को अपना प्रेरणास्रोत मानने वाली दीपा से जब इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “आशीष भैया को जब पदक जीतते देखा, तो हमने सोचा लिया था कि हमें भी यह करना है।”
पिता दुलाल का कहना है कि दीपा की सबसे खास बात यह है कि वह जो ठान लेती हैं, वह पूरा करके रहती हैं और इसी जज्बे का नतीजा था कि उन्होंने 2014 में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में महिला वॉल्ट वर्ग के फाइनल में कांस्य पदक जीता। इस प्रतियोगिता में पदक जीतने वाली वह पहली भारतीय महिला जिमनास्ट बनीं।
भारतीय महिला जिमनास्ट की इस उपलब्धि से त्रिपुरा में खुशी का माहौल था और सभी उनके भारत वापस लौटने का इंतजार कर रहे थे। स्वदेश वापस लौंटी दीपा के घर के बाहर फूलों के गुलदस्ते और मिठाइयां लेकर खड़े लोगों की भीड़ थी।
घर के बाहर खड़ी लोगों की भीड़ से मिली खुशी के अहसास को बयां करने के बारे में जब दीपा से पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “सब इतना सम्मान दे रहे थे और खुश थे। इस बात से मुझे बहुच अच्छा महसूस हुआ।”
2010 से 2014 तक पांच बार राष्ट्रीय विजेता रह चुकीं और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित दीपा से जब जिमनास्ट के अलावा अन्य विकल्पों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “नहीं पता। अगर जिमनास्ट नहीं होती, तो पता नहीं मैं क्या होती?”
अगरतला में पली-बड़ी दीपा को कोच बिस्बेश्वर नंदी ने जिमनास्टिक का प्रशिक्षण दिया। हालांकि, दीपा को अपने पैरों के आकार के लेकर भी करियर की शुरूआत में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
दीपा के पैरों के आकार के कारण नंदी को भी उन्हें प्रशिक्षित करने में कड़ी मेहनत करनी पड़ी, लेकिन अपने कोच की बातों का पालन कर और कठिन परिश्रम से उन्होंने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया।
अपने कोच और पिता के बारे में दीपा ने कहा, “मैं आज जो कुछ भी हूं और अगर इस मंच तक पहुंची हूं, तो अपने कोच और पिता के पूर्ण रूप से दिए गए समर्थन और सहयोग के कारण पहुंची हूं।”
उल्लेखनीय है कि भारत के लिए अब तक कुल 11 पुरुष जिमनास्ट ओलम्पिक में हिस्सा ले चुके हैं। 1952 में दो, 1956 में तीन और 1964 में छह भारतीय शरीक हुए थे। ओलम्पिक तक पहुंचने वाली दीपा पहली भारतीय महिला जिमनास्ट हैं।
रियो से शुक्रवार को अपने गृहनगर पहुंचने के बाद संवाददाताओं से बातचीत में दीपा ने कहा था कि वह अब दिल्ली में भारतीय खेल प्राधिकरण (साईं) के प्रशिक्षण केंद्र में कड़े अभ्यास पर ध्यान देंगी और उनका एकमात्र लक्ष्य ओलम्पिक में पदक हासिल करना है।
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