अहमदाबाद, 9 जून (आईएएनएस)। साल 2002 में गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड में दोषी करार दिए गए 24 लोगों की सजा का ऐलान शुक्रवार तक के लिए टाल दिया गया है। हत्याकांड में कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी सहित 69 लोग मारे गए थे।
छह जून के बाद ऐसा दूसरी बार है, जब दोषियों के लिए सजा का ऐलान टल गया है।
सुनवाई के दौरान जहां अभियोजन पक्ष ने दोषियों को सबसे कड़ी सजा देने की मांग की है, वहीं बचाव पक्ष ने उन्हें कम से कम सजा की मांग की, ताकि उन्हें खुद में सुधार लाने का एक मौका मिले।
न्यायाधीश पी.बी.देसाई की विशेष जांच दल की एक विशेष अदालत ने निर्देश दिया कि दोषियों को शुक्रवार को अदालत में पेश होने की जरूरत नहीं है और अगर जरूरत होगी भी तो उन्हें वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए साबरमती जेल से पेश किया जाएगा, जहां वे बंद हैं।
बहस के दौरान, अभियोजन पक्ष अपने इस रुख पर कायम रहा कि हत्याकांड के दोषियों को अधिकतम सजा दी जाए, जबकि बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया दोषियों को सजा-ए-मौत नहीं देनी चाहिए। दोषियों में 11 हत्या के दोषी हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का संदर्भ देते हुए बचाव पक्ष के वकील अभय भारद्वाज ने कहा कि दोषियों ने न तो सबूतों के साथ छेड़छाड़ की और न ही जमानत के दौरान उन्होंने किसी भी तरह का अपराध किया, इसलिए उन्हें सुधरने का एक मौका देना चाहिए।
बचाव पक्ष के वकील ने दृढ़तापूर्वक दलील दी कि अदालत को इस बात को संज्ञान में लेना चाहिए कि गुलबर्ग सोसायटी में दंगे का कारण एहसान जाफरी द्वारा गोलीबारी बना, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हो गए। उनके मुताबिक, इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के लिए मूल रूप से जाफरी जिम्मेदार थे।
अदालत ने बीते दो जून को कुल 66 आरोपियों में से 24 को दोषी ठहराया था, जबकि 36 को बरी कर दिया था। छह आरोपियों की मुकदमे की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी। 24 दोषियों में से 11 को हत्या सहित विभिन्न मामलों में दोषी ठहराया गया। एक व्यक्ति को हत्या का प्रयास तथा विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के नेता अतुल वैद्य सहित बाकी 12 को मामूली आरोपों जैसे दंगा भड़काने तथा अवैध बैठक करने का दोषी ठहराया गया।
विशेष जांच दल (एसआईटी) के वकील आर.सी.कोदेकर ने छह जून को हुई पिछली सुनवाई के दौरान दोषियों को उचित व कड़ी सजा की मांग की थी, जबकि दंगे में जिंदा बचे लोगों तथा पीड़ितों के वकील एस.एम.वोरा ने दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा व पीड़ितों के लिए मुआवजे की मांग की।
अदालत ने आरोपियों पर से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120बी के तहत आपराधिक षड्यंत्र रचने के आरोप को हटा दिया था।
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