नई दिल्ली, 10 मार्च (आईएएनएस)। मौजूदा समय में कई युवाओं के लिए ऊंची आवाज में संगीत सुनने के लिए लगातार हेडफोन और इयरफोन का इस्तेमाल करना एक सनक एवं फैशन बन गया है। लेकिन, यह आदत उनकी सेहत के लिए बेहद गंभीर खतरे की वजह बन रही है। यह उनके कान के पर्दे को क्षतिग्रस्त कर सकती है, यह शोर उन्हें ऐसे बहरेपन का शिकार बना सकता है, जिसका उपचार संभव नहीं है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने शोर से होने वाली बहरेपन की समस्या के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए ‘सेफ साउंड इनिशिएटिव’ की शुरुआत की है। आईएमए का कहना है कि कई युवा टिन्निटस (कानों में गुनगुनाहट की समस्या) की शिकायत लेकर अस्पताल आ रहे हैं। यह समस्या इयरफोन, हेडफोन और मोबाइल फोन जैसे गैजेट के लंबे समय तक उपयोग के कारण पैदा होती है। इनके लगातार इस्तेमाल के कारण ‘थर्मल एंड हाई फ्रीक्वेंसी हीयरिंग लॉस’ का खतरा पैदा होता है।
अध्ययनों के अनुसार, जिस नाइट क्लब में 110 डेसीबल का संगीत बज रहा होता है, वहां एक मिनट के लिए रहना, 15 मिनट से अधिक समय के लिए 95 डेसीबल पर एमपी 3 प्लेयर सुनना और एक घंटे तक 90 डेसीबल का संगीत सुनते हुए मेट्रो में सफर करना, ये सभी एंप्लीफाइड म्युजिक एक्सपोजर के उदाहरण हैं और इन सभी गतिविधियों में से किसी भी गतिविधि में एक दिन के लिए शामिल होने का मतलब अधिक शोर के संपर्क में आना है।
इस विषय पर रविवार (12 मार्च) को नई दिल्ली के ली मेरिडियन होटल में आईएमए द्वारा आयोजित ‘सेफ साउंड इनिशिएटिव’ पर आयोजित दूसरी नेशनल कॉन्फ्रेंस में विचार विमर्श किया जाएगा। सम्मेलन के एजेंडे में स्वास्थ्य, कानूनी और संगठनात्मक मुद्दों के साथ-साथ शोर की समस्या के वित्तीय पहलू भी शामिल हैं।
पद्मश्री से सम्मानित आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल इस सम्मेलन की अध्यक्षता करेंगे तथा सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनिल आर. दवे मुख्य अतिथि होंगे।
‘सेफ साउंड इनिशिएटिव’ आईएमए की एक राष्ट्रीय परियोजना है, जो सभी राज्यों में शोर प्रदूषण से उत्पन्न स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए काम कर रही है।
डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, “शोर के कारण होने वाली श्रवण संबंधी समस्या वैश्विक स्तर पर स्थाई बहरेपन के लिए मुख्य कारण के तौर पर उभरी है। यह हृदय और मस्तिष्क के साथ-साथ अंत:स्रावी और प्रतिरक्षा प्रणाली सहित शरीर के सभी अंगों को प्रभावित करती है। अत्यधिक शोर के कारण मधुमेह, उच्च रक्तचाप, दिल की समस्याएं, स्ट्रोक और यहां तक कि कैंसर सहित जीवनशैली से जुड़ी सभी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।”
आवाज फाउंडेशन, मुंबई इस अभियान में आईएमए की भागीदार है। आईएमए (सेफ साउंड इनिशिएटिव) के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. सी. जान पणिक्कर बताते हैं, “शोर के कारण होने वाली श्रवण संबंधी क्षति जीवनशैली से जुड़ी हुई बीमारी है और यह स्थाई बहरेपन का मुख्य कारण है। कार का हार्न बजाना, मोबाइल फोनों का लगातार उपयोग करना तथा घर की आवाज (अधिक आवाज पर पंखे चलाना, टेलीविजन देखना, अधिक वाल्यूम पर रेडिया सुनना तथा शोर पैदा करने वाले घरेलू उपकरणों का इस्तेमाल करना) आदि सभी श्रवण संबंधी समस्या के लिए जिम्मेदार हैं।”
आईएमए ने ध्वनि प्रदूषण पर रोक लगाने के लिए कई सुझाव दिए हैं। संस्था ने लोगों से कहा है कि वे शोर से बचाने वाले उपकरणों का उपयोग करें। जब 80 डेसीबल से अधिक की ध्वनि के संपर्क में आएं तो इयर प्लग्स और मफलर का उपयोग करें। मोबाइल फोन का लगातार प्रयाग नहीं करें। जहां तक संभव हो स्पीकर फोन का उपयोग करें। ध्वनिरहित पटाखों का उपयोग करें, इयरफोन/हेडफोन का इस्तेमाल करने के दौरान ब्रेक लें, कार का हार्न बजाने से परहेज करें तथा अधिक शोर पैदा करने वाले घरेलू उपकरणों का इस्तेमाल नहीं करें।
जर्मनी में किए गए एक अध्ययन में दिल्ली को गुआंगजौ (चीन), पेरिस और काहिरा के बाद दुनिया में चौथे सबसे अधिक शोर वाले शहर के रूप में शुमार किया गया है।
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