इस विषय में सामान्य प्रशासन विभाग एक मसौदा बनाने में जुटा है। इस विषय में मंत्रिमंडल के सदस्यों सहित विभागीय प्रमुखों से भी राय ली गई है। यदि यह मसौदा लागू हो गया तो राज्य में डेढ़ लाख कर्मचारी प्रभावित होंगे।
अतिरिक्त सचिव के.आर. मिश्रा के अनुसार विभाग दो-तीन दिन में यह मसौदा तैयार कर लेगा और इसे नई तबादला नीति में शामिल कर लिया जाएगा। यहां यह बताना जरूरी है कि राज्य में अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी आदिवासी क्षेत्रों में अभी पदस्थ नहीं रहे हैं।
इस मसौदे के अनुसार नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती आवश्यक होगी। अभी तक राज्य में जो अधिकारी नक्सली क्षेत्र में तैनात होता है उसे उस क्षेत्र का जानकार मानकर उसे वहां से हटाने में रुचि नहीं ली जाती है। यदि कुछ समय के लिए उसे हटाया भी जाता है तो बाद में उसकी वहीं पदोन्नति कर दी जाती है।
सूत्रों का कहना है कि राज्य निर्माण के बाद आदिवासी क्षेत्रों में पदास्थापना के लिए ठीक तरीके से विचार ही नहीं किया गया। सूत्रों का कहना है कि मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया है कि नक्सल प्रभावित तथा दूसरे अन्य आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की पदस्थापना अनिवार्य होना चाहिए। उनके अपने सेवाकाल के कम से कम दो साल और अधिकतम तीन साल आदिवासी क्षेत्रों में तैनात रहने की अनिवार्यता होनी चाहिए।
पता चला है कि सामान्य प्रशासन विभाग आदिवासी इलाकों में सेवा देने के बिंदु को अनिवार्य रूप से जोड़ने की कवायद में जुट गया है।
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