शिमला, 9 मई (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश में 13 साल पहले चोरी हुए बहादुरी पदक जॉर्ज क्रॉस के मिल जाने के बाद भारतीय जवान नायक कृपाराम की विधवा ब्राह्मी देवी का कहना है कि अब वह शांति से मर सकती हैं। कृपाराम को यह पदक मरणोपरांत दिया गया था। ब्रिटिश अधिकारियों ने इस पदक को खोज निकाला है।
शिमला, 9 मई (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश में 13 साल पहले चोरी हुए बहादुरी पदक जॉर्ज क्रॉस के मिल जाने के बाद भारतीय जवान नायक कृपाराम की विधवा ब्राह्मी देवी का कहना है कि अब वह शांति से मर सकती हैं। कृपाराम को यह पदक मरणोपरांत दिया गया था। ब्रिटिश अधिकारियों ने इस पदक को खोज निकाला है।
दिल्ली स्थित ब्रिटिश उच्चायोग ने यह पदक एक नीलामी संस्था से बरामद किया है। ब्रिटिश उच्चायोग इस पदक को भारतीय शहीद की विधवा को उनके पैतृक गांव बिलासपुर जिले में सोमवार को एक समारोह में वापस करने जा रहा है। ब्राह्मी लंबे अर्से से इस पदक को वापस हासिल करने के लिए संघर्षरत थीं।
ब्राह्मी देवी (80) ने फोन पर आईएएनएस को बताया, “इतने सालों तक मैं अपने पति के खोए हुए सम्मान को वापस पाने के लिए जूझ रही थी। यह मेरे पति की आखिरी निशानी है। अब, मैं इसे किसी भी कीमत पर खोने नहीं दूंगी।”
ब्राह्मी देवी को अपने शहीद पति की मृत्यु के बाद 1946 में उस समय के वायसराय फील्ड मार्शल लॉर्ड वावेल से जॉर्ज क्रॉस पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
उनके पति नायक कृपाराम 12 सितंबर, 1945 को बेंगलुरू में एक शिविर में एक राइफल ग्रेनेड को निष्क्रिय करने के दौरान अपने साथियों को बचाने में खुद शहीद हो गए थे।
लेकिन 2002 में देवी के घर से यह पदक चोरी हो गया था। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद ब्रिटेन में उनके वकील पदक वापस पाने में सफल रहे।
ब्राह्मी देवी का मुकदमा बिना शुल्क के लड़ने वाले ब्रिटेन के बैरिस्टर इयान मेयस इस समारोह को संबोधित करेंगे।
इस अवसर पर चंडीगढ़ में ब्रिटेन के उप उच्यायुक्त डेविड लेलियट, लोकसभा सदस्य अनुराग ठाकुर, गांव की सरपंच अनीता ठाकुर और स्थानीय निवासी भी उपस्थित होंगे।
ब्राह्मी देवी ने कहा, “मेरी आखिरी इच्छा मेरे पति की उस आखिरी निशानी को वापस पाना है और यह पूरी होने जा रही है।”
ब्रिटिश उच्चायोग के मुताबिक, कृपाराम (28) ने अपने साथियों को बचने की आवाज लगाते हुए ग्रेनेड को एक सुरक्षित दूरस्थ स्थान पर फेंकने की कोशिश की, लेकिन ग्रेनेड उनके हाथ में ही फट गया, जिसमें उनकी मौत हो गई।
हालांकि उनकी निस्वार्थ सेवा से उनकी यूनिट के सदस्यों की जान बच गई। उन्हें मरणोपरांत 15 मार्च, 1946 को जॉर्ज क्रॉस पदक से सम्मानित किया गया।
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