तेलंगाना ने सिजेरियन डिलीवरी रोकने को उठाए कदम : सुवर्णा घोष (साक्षात्कार)

नई दिल्ली, 5 फरवरी (आईएएनएस)। सिजेरियन और सामान्य प्रसव पर समान शुल्क लगाने के लिए अभियान शुरू करने वाली मुंबई की वाली सुवर्णा घोष को जब खुद सिजेरियन डिलीवरी से दिक्कतों का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने ‘सिजेरियन और नॉर्मल डिलीवरी के लिए एक समान फीस’ मुद्दे पर अभियान शुरू किया। उनकी यह मुहिम अब रंग लाती दिख रही है।

नई दिल्ली, 5 फरवरी (आईएएनएस)। सिजेरियन और सामान्य प्रसव पर समान शुल्क लगाने के लिए अभियान शुरू करने वाली मुंबई की वाली सुवर्णा घोष को जब खुद सिजेरियन डिलीवरी से दिक्कतों का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने ‘सिजेरियन और नॉर्मल डिलीवरी के लिए एक समान फीस’ मुद्दे पर अभियान शुरू किया। उनकी यह मुहिम अब रंग लाती दिख रही है।

कुछ राज्य सरकारों ने जहां, इस मुद्दे पर समिति गठित की है, वहीं तेलंगाना ने सिजेरियन डिलीवरी रोकने के लिए मिडवाइजरी प्रोग्राम शुरू किया गया है।

सुवर्णा ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “तेलांगाना में सिजेरियन को रोकने के लिए एक मिडवाइजरी प्रोग्राम शुरू किया गया है, ताकि सामान्य प्रसव को बढ़ावा दिया जा सके। इससे पता चलता है कि वह समझ रहे हैं कि पूरे स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए यह कितना खतरनाक है।”

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि सिजेरियन राज्य का विषय है और राज्य की भी इसमें उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी की केंद्र की। इसलिए हम इस पिटीशन को सभी राज्यों में ले जा रहे हैं। इसी कड़ी में मैंने दिल्ली और महाराष्ट्र सरकार के समक्ष अपनी अपील दायर की है और उनकी प्रतिक्रिया भी मुझे इस पर मिली है।”

महाराष्ट्र सरकार ने अस्पतालों में पारदर्शिता जांचने के लिए गठित 10 सदस्यीय आयोग में सुवर्णा को जगह दी है। इस आयोग में चिकित्सक, यूनीसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारी शामिल हैं। उन्होंने आशा जताई कि इससे जरूर कुछ न कुछ सकारात्मक परिणाम निकलकर लोगों के सामने आएगा।

सुवर्णा ने कहा, “देशभर में बढ़ रहे सिजेरियन के मामलों से चिंतित होकर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने भी राज्यसभा में इस मामले को जोर शोर से उठाया था।”

उन्होंने कहा, “देश के वर्तमान हालातों पर गौर किया जाए तो हमारे देश में सिजेरियन का जो आंकड़ा है वह बहुत ही ज्यादा है, और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने काफी साल पहले ही कहा था कि अगर 10 से 15 प्रतिशत से ज्यादा सिजेरियन होते हैं तो यह जरूरत से ज्यादा हो रही है।”

महाराष्ट्र के मुंबई की रहने वाली सुवर्णा घोष ने एक साल पहले मुंबई में सिजेरियन और सामान्य प्रसव पर समान शुल्क लगाने के लिए अभियान शुरू किया था। इसे देशभर में फैलाने के लिए उन्होंने ऑनलाइन अभियान चलाया, जिसके तहत उन्होंने एक याचिका (पिटीशन) दायर की जिसमें निजी अस्पतालों से सवाल किया और अपने यहां होने वाले सिजेरियन के आंकड़ों से अवगत कराने को कहा।

आम लोगों, विशेषकर माताओं से जुड़ी यह मुहिम रंग लाई और उनकी इस पिटीशन पर अब तक उन्हें 1.5 लाख लोगों का समर्थन मिल चुका है।

सुवर्णा ने मुंबई से आईएएनएस को फोन पर अपने अभियान की शुरुआत के बारे में बताया, “करीब एक साल पहले जनवरी के अंत में सिजेरियन के आंकड़ों को जारी करने के लिए हमने भारत सरकार के पास एक पिटीशन दाखिल किया था। इस पिटीशन में मैंने अपने 17 साल पुराने अनुभव को साझा किया था और इसी के कारण मैंने इस विषय पर काम करना शुरू किया।”

सुवर्णा ने बताया, “सिजेरियन से मां और बच्चे के स्वास्थ्य में कोई भी सुधार नहीं होता है। अगर हमारे अस्पतालों में इनका आंकड़ा इतना ज्यादा है तो देखना चाहिए कि क्यों यह आंकड़ा इतना ज्यादा है, इसके पीछे क्या कारण है। और हमारा यह मानना है कि आधिकारिक आंकड़े हमेशा वास्वकिता से थोड़े ज्यादा होते हैं।”

सिजेरियन और सामान्य प्रसव पर एक शुल्क लगाने के कदम को क्या अस्पताल स्वीकार करेंगे इस सवाल पर सुवर्णा ने आईएएनएस से कहा, “जी बिल्कुल, मुझे लगता है कि निजी अस्पताल इस कदम पर जरूर सहमत होंगे और वह स्वीकार भी कर रहे हैं, क्योंकि कुछ अस्पताल हैं जो अपने यहां सही तरीके से काम कर रहे हैं, तो वह अपना काम आगे बढ़ाने के लिए अगर यह घोषित करते हैं तो इसमें सबका फायदा है।”

उन्होंने कहा, “इससे उन्हें ही ज्यादा फायदा है, क्योंकि वह दिखा सकते हैं कि उनके यहां पूर्ण पारदर्शिता अपनाई जाती है। मेरा मानना है कि वह जरूर मानेंगे, क्योंकि इसमें न मानने वाली कोई बात ही नहीं है और मुझे नहीं लगता है हर कोई आदमी मेडिकल पेशे में पैसों के लिए काम कर रहा है, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अच्छा काम करना चाहते हैं।”

अपने अभियान को आगे ले जाने के बारे में उन्होंने बताया, “जब हमने अपना अभियान शुरू किया था तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा और महिला बाल विकास मंत्रालय मेनका गांधी को इस बात से अवगत कराया था। मेनका गांधी ने इस मुद्दे पर हमें अपना पूर्ण समर्थन दिया और स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस पर कार्रवाई करते हुए एक पत्र उन्होंने हर राज्य को लिखा और सिजेरियन के आंकड़ों पर नजर रखने का आदेश दिया।”

उन्होंने कहा, “सिजेरियन के रेट को नियंत्रित करने के साथ और भी चीजों में बदलाव करने की जरूरत है जैसे चिकित्सकों की ट्रेनिंग और मिडवाइजरी शिक्षा। इन सबकों एक एक कर के निशाना बनाना होगा और एक आम नागरिक होने के नाते यह हमारी जिम्मेदारी है और क्योंकि इनसे एक महिला होने के नाते हमें इनसे जूझना पड़ता है।”

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएचएफएस) की चौथी रिपोर्ट (2015-16) में देश भर में सिजेरियन (ऑपरेशन) से पैदा होने वालों बच्चों के प्रतिशत में दोगुनी वृद्धि ने संसद से लेकर आम जनता के बीच चिंता की एक नई रेखा खींच दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस स्थिति को चिंताजनक करार दे चुका है। ऐसे में इस मुद्दे को जमीनी स्तर पर उठाने वाली एक महिला ने न केवल राज्य स्तर पर, बल्कि देशभर में सिजेरियन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

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