अगरतला, 7 मई (आईएएनएस)। वाम दलों ने भले ही त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (टीटीएएडीसी) की सभी 30 सीटों पर विजय हासिल कर ली हो, लेकिन इसके वोट प्रतिशत में 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
अगरतला, 7 मई (आईएएनएस)। वाम दलों ने भले ही त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (टीटीएएडीसी) की सभी 30 सीटों पर विजय हासिल कर ली हो, लेकिन इसके वोट प्रतिशत में 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
टीटीएएडीसी के चुनाव रविवार को हुए थे और बुधवार को परिणामों की घोषणा की गई। वोट प्रतिशत के मामलों में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस पांचवें पायदान पर खिसक गई है वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कांग्रेस से एक स्थान आगे है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे को 54 फीसदी वोट मिले हैं। हालांकि यह आंकड़ा पिछले चुनाव में मिले वोट के आंकड़ों से दस फीसदी कम हैं।
वाम मोर्चे ने टीटीएएडीसी की उन सभी 28 सीटों पर जीत दर्ज कर ली है, जिन पर चुनाव हुआ था। माकपा ने 25 सीटें जीती हैं वहीं तीन छोटे-छोटे दलों ने एक-एक सीट पर कब्जा किया है। आदिवासियों में से दो सदस्यों को सरकार नामित करेगी।
जनजातीय इलाकों में वामदल की यह लगातार तीसरी जीत है।
जनजातीय आधारित दल इंडीजीनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) और इंडीजीनियस नेशनलिस्ट पार्टी ऑफ त्रिपुरा ने उल्लेखनीय रूप से क्रमश: 18.6 फीसदी और 10.77 फीसदी मत हासिल किए हैं। 2010 के चुनाव में दोनों दलों का वोट प्रतिशत न के बराबर था।
आईएनपीटी के अध्यक्ष और पूर्व उग्रवादी नेता विजय कुमार हरांगखवल तीसरे स्थान पर आए हैं। आईएनपीटी ने जुलाई 2014 में कांग्रेस के साथ दशकों पुराना गठबंधन तोड़ लिया था।
भाजपा को 7.87 फीसदी वोट मिले हैं। जनजातीय परिषद के चुनाव में भाजपा का यह अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है।
कांग्रेस को मात्र 5.49 फीसदी वोट मिले हैं। यह प्रतिशत 2010 में मिले वोटों का एक तिहाई से भी कम है।
राजनीतिक विश्लेषक तापस डे ने आईएएनएस को बताया, “एक अलग राज्य की मांग ने आदिवासियों को आईपीएफटी को बड़ी संख्या में मत डालने के लिए प्रभावित किया। यह त्रिपुरा की राजनीति में एक नया दौर है।”
उन्होंने कहा, “सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों को यह ध्यान रखना होगा कि जनजातीय और गैर-जनजातीय लोगों के बीच दीवार खड़ी न हो। इस बात का ध्यान राष्ट्रीय पार्टियों को भी रखना चाहिए।”
राजनीतिक विश्लेषक संजीव देब ने कहा, “आदिवासियों के बीच पर्याप्त आधार के बावजूद माकपा इस समुदाय की युवा पीढ़ी से अलग-थलग पड़ गई है।”
त्रिपुरा की 37 लाख की जनसंख्या में आदिवासियों की संख्या एक तिहाई है और वे राज्य की सत्ता के नेता का चयन करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
माकपा की राज्य इकाई के सचिव और केंद्रीय समिति के सदस्य विजन धर ने आईएएनएस से कहा, “आईपीएफटी की अलग राज्य की भावनात्मक मांग उन्हें गुमराह कर सकती है।”
धर ने कहा कि भाजपा का चुनाव अभियान हिंदुत्व पर आधारित था और इसी से उसके वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ है।
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