त्रिपुरा : 16 साल बाद आतंकियों के चंगुल से मुक्त हो घर पहुंचे साहा

अगरतला, 19 अप्रैल (आईएएनएस)। रंजन साहा (50) के मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए जद्दोजहद कर रहे परिजनों ने जब सोलह साल बाद उन्हें देखा तो हतप्रभ रह गए। केला बेचने वाले साहा को आतंकवादियों ने अपहरण के बाद बांग्लादेश में अपने गुप्त ठिकाने पर बंधक बनाकर रखा था। कभी भागने की कोशिश नहीं करने और अच्छे व्यवहार के चलते आतंकवादियों ने उन्हें अंतत: मुक्त कर दिया।

अगरतला, 19 अप्रैल (आईएएनएस)। रंजन साहा (50) के मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए जद्दोजहद कर रहे परिजनों ने जब सोलह साल बाद उन्हें देखा तो हतप्रभ रह गए। केला बेचने वाले साहा को आतंकवादियों ने अपहरण के बाद बांग्लादेश में अपने गुप्त ठिकाने पर बंधक बनाकर रखा था। कभी भागने की कोशिश नहीं करने और अच्छे व्यवहार के चलते आतंकवादियों ने उन्हें अंतत: मुक्त कर दिया।

कमजोर आवाज में साहा ने आईएएनएस से कहा, “जैसा कि मैं अपने चार सदस्यीय परिवार में अकेला कमाने वाला था, इसलिए अपहरण के बाद से ही विद्रोहियों से मुक्त करने के लिए आग्रह कर रहा था। लेकिन हमेशा वे नाराज हो जाते और मेरा उत्पीड़न करते थे।”

उन्होंने कहा, “दक्षिणी बांग्लादेश के चटगांव के पहाड़ी इलाके(सीएचटी) के जंगल में उन लोगों ने मुझसे तरह-तरह के काम करवाए। मैं उस स्थान का सही नाम नहीं जानता हूं। वहां आतंकवादियों ने 25 अन्य अपहृत लोगों को भी बंधक बनाकर रखा है, जो शिविर में काम कर रहे हैं।”

त्रिपुरा नेशनल फ्रंट (एनएलएफटी) के आतंकवादियों ने अप्रैल, 2000 में दक्षिण अगरतला से 35 किलोमीटर दूर जामपुईजला से अन्य दो लोगों के साथ साहा का अपहरण किया था। वह जामपुईजला केला खरीदने गए थे, जिसे अगरतला में बेचते।

साहा ने कहा, “सीएचटी स्थित आतंकवादियों के शिविर तक पहुंचने से पहले हमे पहाड़ी इलाकों से गुजरना पड़ता, इसलिए उन लोगों ने एक महीना से अधिक समय तक हमारी आंखों पर पट्टी बांध रखी थी।”

उन्होंने कहा, “अपहर्ताओं को बाद में पता चल गया कि हम फिरौती की रकम नहीं अदा कर पाएंगे, इसलिए वे हमसे अन्य अजीब तरह के काम कराने के अलावा खाना बनवाने, पानी संग्रह कराने का भी काम कराते थे। हमारे साथ अपहृत दो अन्य लोगों को अज्ञात ठिकानों पर भेज दिया गया।”

साहा ने कहा कि शारीरिक रूप से अक्षम होने और शत्रुतापूर्ण माहौल होने के बावजूद उन्होंने लगातार चुपचाप कठिन काम किया। वह अपनी पत्नी, दो बेटों और लाडली बेटी के लिए इस भयानक जिंदगी से छुटकारा पाने के लिए लगातार भगवान से प्रार्थना करते रहते थे।

साहा के अनुसार, आतंकवादी इस बात को लेकर खुश थे कि उन्होंने कभी भी भागने कोशिश नहीं की।

साहा ने कहा, “हाल में भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली होगी। आतंकवादियों ने कुछ पैसे देकर मुझको एक महीने पहले छोड़ दिया। इसके बाद मैं बांग्लादेश के हबीबगंज जिला स्थित माधबपुर में अपने एक संबंधी के घर चला गया। वहां से बांग्लादेशी विचौलिए की मदद से छिपकर सीमा पार किया और गत सप्ताह अगरतला के शिबनगर स्थित अपने घर पहुंच गया।”

साहा के अपहरण के बाद उनके परिजनों ने जरनिया पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उनका पता लगाने के लिए मंत्रियों, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और अन्य प्रभावशाली लोगों से भी मुलाकात की थी।

रंजन साहा के बड़े पुत्र अभिजीत साहा ने आईएएनएस से कहा, “हमलोगों ने पिता के मृत्यु प्रमाण पत्र लेने के लिए 2007 में अदालत में मुकदमा भी किया था, जो अभी तक लंबित है।”

गोबिंद बल्लभ पंत मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में इलाज करा रहे साहा अपने भविष्य को लेकर आशान्वित हैं। स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद वह फिर अपना व्यवसाय शुरू करना चाहेंगे।

साहा की पत्नी सुमित्रा (45) ने अपनी आप बीती सुनाते हुए कहा कि पति के अपहरण के बाद बच्चों को पालने के लिए उन्होंने पड़ोसियों के घरों में रसोइए का काम किया।

सुमित्रा ने आईएएनएस से कहा, “मैं भगवान की ऋणी हूं कि मेरे छोटे बेटे राजेश को कोलकता में एक निजी कंपनी में अस्थाई नौकरी मिली। मैंने अपनी बेटी की शादी की और वह खुश है। भगवान की कृपा से ही मेरे पति भी वापस लौट आए।”

त्रिपुरा पुलिस के दस्तावेजों के अनुसार, 1997 से 2014 तक जब राज्य में आतंकवाद चरम पर था तो आतंकवादियों ने करीब 2430 लोगों का अपहरण किया था, जिनमें विधायक, राजनेता, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी और आम नागरिक शामिल थे। इनमें 1705 लोगों को आतंकवादियों ने बाद में रिहा कर दिया था।

सुरक्षा और आतंकवाद के विशेषज्ञ मानस पॉल ने आईएएनएस से कहा, “कई वर्षो तक फिरौती के लिए अपहरण आतंकवादियों का कारोबार बन गया था। फिरौती लेने के बाद आतंकवादियों ने कई लोगों को रिहा कर दिया, लेकिन कई ऐसे लोग मार भी दिए गए जिनके परिजन फिरौती नहीं दे सके या फिर आतंकवादियों की अन्य मांगें पूरी नहीं कर सके।”

एनएलएफटी और ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (एटीटीएफ) के सदस्य बांग्लादेश के कई भागों में शिविर बनाए हुए हैं और हथियार चलाने का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

केंद्र सरकार ने इन दोनों संगठनों पर 1997 में प्रतिबंध लगा दिया था। ये दोनों संगठन त्रिपुरा को भारत से अलग करने की मांग करते हैं। एटीटीएफ अब प्राय: निष्क्रिय हो गया है, क्योंकि उसके अधिकांश सदस्यों ने समर्पण कर दिया है।

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