दिल्ली थिएटर का दस्तावेजीकरण

नई दिल्ली, 30 मार्च (आईएएनएस)। कोलकाता या मुंबई के विपरीत, दिल्ली ने 1960 के दशक तक देश के थिएटर मानचित्र पर कोई महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज नहीं की, लेकिन उस अवधि के बाद देश की राजधानी में एक जीवंत नाटक का माहौल देखने को मिला।

राश्ट्रीय राजधानी स्थित भारतीय रंगकर्म के आर्काइव तथा संसाधन केन्द्र – नटरंग प्रतिष्ठान ने अपनी अत्यंत महत्वाकांक्षी योजना के लिए दिल्ली के चार प्रतिष्ठित थियेटर समूहों को शामिल किया है जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय राजधानी में स्वर्णिम काल के थियेटर की यादों और योगदानों को जीवंत बनाना है।

रजा फाउंडेशन के कार्यकारी ट्रस्टी अशोक वाजपेयी कहते हैं, “हम आज के युवाओं को दिल्ली थिएटर की उस अवधि की एक झलक दिखाना चाहते हैं। उस समय के रंगकर्मियोें की यादों को नटरंग प्रतिष्ठान के द्वारा अभिलेखीय परियोजना के माध्यम से दर्ज किया जा रहा है और रजा फाउंडेशन उनकी मदद कर रहा है।”

दिवंगत कलाकार एस. एच. रजा द्वारा स्थापित फाउंडेशन का उद्देश्य युवा प्रतिभाओं के लिए विभिन्न कला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रकाशनों और फेलोशिपों की सुविधा प्रदान करना है।

इस सिलसिले में साहित्य अकादमी ने राजधानी में दो-दिवसीय कार्यक्रम (28- 29 मार्च) ‘रंग स्मरण’ का आयोजन किया, जहां दिल्ली से चारों प्रतिष्ठित थियेटर समूहों – अभियान, यात्रिक, दिशांतर और दिल्ली आर्ट थियेटर के सदस्यों ने पुरानी स्मृतियों को तरोताजा किया।

यहां कई विषयों पर चर्चा की गयी। चर्चा का एक विषय ‘अच्छे मूल लेखन और अनुवादों की कमी’ भी थी जो नाटकों की दशा और दिशा में बदलाव ला सकती थी।

वयोवृद्ध थिएटर व्यक्तित्व राजिंदर नाथ ने कहा कि ‘यहां नाटकों का अकाल है’। राजिंदर नाथ ने 1967 में मूल लिपियों का निर्माण करने के लिए अभियान थियेटर समूह की स्थापना की थी जो कभी भी हिंदी में नहीं की गई।

राजिंदर नाथ ने कहा, “इससे पहले, जब भी बंगाली और मराठी में नाटक किया जाता था, तो वह मेरे पास तुरंत आते थे। मैंने विजय तेंदुलकर और वसंत देव के कई नाटकों को हिंदी में रूपांतरित किया था, लेकिन अब स्रोत सूख चुके हैं और इसलिए अभियान अब चुप है। हम किसी भी नए प्रोडक्शन के साथ आने में असमर्थ हैं। हमारा आखिरी नाटक 2008 में मंचन किया गया था।”

अभियान की प्रस्तुतियांे में घासीराम कोतवाल, जात ही पूछो साधु की शामिल है। इसके अलावा, राजिंदर नाथ ने 1981 और 1984 में श्रीराम केंद्र के लिए क्रमश: तेंदुलकर की अंजी और सखाराम बिंदर का निर्देशन किया था।

1960 में ओम शिवपुरी द्वारा स्थापित एक अन्य प्रमुख नाटक समूह दिशांतार के सदस्यों ने भी दिल्ली थिएटर के प्रमुख दिनों का हिस्सा होने के अपने अनुभवों को साझा किया। दिशांतर ने पूरे देश में कुल 30 शो आयोजित किए हैं।

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की पूर्व निदेशक अनुराधा कपूर ने कहा, “मेरी सबसे यादगार स्मृति ओम शिवपुरी की छात्रा होना था। यह हमारे लिए एक स्कूल जैसा था और यहां हमें सीखने का महान अनुभव हासिल हुआ। हममें एक बड़े आधुनिक भारतीय रंगमंच आंदोलन का हिस्सा होने की भावना थी।”

नटरंग प्रतिष्ठान की कीर्ति जैन ने कहा, “स्वतंत्रता के बाद, कई समूह और व्यक्ति उभर कर आये और इस क्षेत्र में थिएटर के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दुर्भाग्य से, इन समूहों में से अधिकांश के काम और योगदान को याद नहीं किया जाता है या थियेटर कर्मियों की वर्तमान पीढ़ी उन्हें नहीं जानती है। लेकिन इस कार्यक्रम के माध्यम से हम उन यादों को फिर से पुनर्जीवित करने और एक मौखिक इतिहास के रूप में रिकॉर्ड करने की उम्मीद करते हैं।”

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