नई दिल्ली, 19 अक्टूबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय संग्रहालय के सुरक्षित संग्रह से चुने गए सुसज्जित हथियारों और जिरह-बख्तरों की प्रदर्शनी यहां जारी है। यह प्रदर्शनी 5 नवंबर तक चलेगी। इसमें अलग-अलग समय और क्षेत्र में प्रचलित नक्काशीदार खंजर, तलवार और जिरह-बख्तर व पिस्तौल प्रदर्शित किए गए हैं।
भारतीय हथियारों और जिरह-बख्तरों का इतिहास यूं तो प्रागैतिहासिक काल से ही शुरू होता है, लेकिन मध्यकाल में इन्हें खूबसूरत बनाने पर जोर दिया गया, जिसके नमूने के तौर पर इन पर की गई नक्काशी और चित्रकारी को देखा जा सकता है।
इस प्रदर्शनी का उद्घाटन बुधवार को राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. वी.आर. मणि ने किया।
सल्तनत और मुगल शासन के दौरान हथियारों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए और हथियारों पर फारस, अरब और तुर्की के प्रभाव आमरूप से दिखने लगे। इसके उदाहरण हैं फारस की शमसीर और अरब का जुल्फिकार।
प्रदर्शनी में विभिन्न प्रकार के खंजर, आत्म सुरक्षा के लिए आयातित हथियार और आमने-सामने की लड़ाई में इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार प्रदर्शित किए गए हैं। इन हथियारों में क्षेत्रीय विभिन्नता भी है, जैसे मुगलों का जमाधार, जम्बिया और खंजर, अफगानों का छुरा, राजपूतों का खपुआ, सिखों की कुरौली और नेपालियों की खुखरी।
प्रदर्शित किए गए खंजरों में हाथी दांत के मूठ वाले खंजर, जड़ाऊ खंजर और बिल्लौरी खंजर भी शामिल हैं।
प्रागैतिहासिक काल से लेकर गुप्तकाल तक हम पाते हैं कि हथियार और जिरह-बख्तर अपने निर्धारित कामकाज में इस्तेमाल किए जाते थे और उनमें कोई सौंदर्य तत्व नहीं था। मध्यकाल से हथियारों और जिरह-बख्तरों पर आभूषण चढ़ाने का काम शुरू हुआ।
आभूषण जड़े हथियार व्यक्ति की राजनीतिक शक्ति और उसके आर्थिक प्रभाव दिखाते थे। हथियारों और जिरह-बख्तरों का अध्ययन इसलिए दिलचस्प है, क्योंकि इन हथियारों ने हमारे इतिहास को मोड़ देने में अपनी-अपनी भूमिका निभाई है।
इन हथियारों और जिरह-बख्तरों का तकनीकी पक्ष यह है कि इनमें कला का प्रदर्शन किया गया है और सोना, चांदी, तांबा, पीतल, सुलेमानी पत्थर, हाथी दांत, सींग, मुक्ता तथा कीमती पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है।
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