नई दिल्ली, 19 अगस्त (आईएएनएस)। ग्रामीण इलाकों में भले ही चिकित्सक ढूंढ़े नहीं मिलते, लेकिन शहरों में इनके चौंकानेवाले आंकड़े सामने आए हैं। लगभग 75 फीसदी डिस्पेंसरी, 60 फीसदी अस्पताल तथा 80 फीसदी चिकित्सक शहरी इलाकों में हैं और इस प्रकार ये देश के केवल 28 फीसदी हिस्सों में ही अपनी सेवाएं मुहैया करा रहे हैं।
केपीएमजी तथा ऑर्गनाइजेशन ऑफ फार्मास्यूटिकल प्रॉड्यूसर्स ऑफ इंडिया (ओपीपीआई) द्वारा शुक्रवार को जारी एक नए रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है।
हेल्थकेयर एक्सेस इनिशिएटिव्स पर केपीएमजी-ओपीपीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का स्वास्थ्य देखभाल पर कुल खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मात्र 4.1 फीसदी है, जो दुनिया में सबसे कम है।
केपीएमजी इंडिया के पार्टनर एंड नेशनल हेड (लाइफ साइंसेज प्रैक्टिस) उत्कर्ष पालनितकर ने कहा, “स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता, बीमा कंपनियां तथा स्वास्थ्य देखभाल व औषधि कंपनियां स्वस्थ देश के इच्छित दृष्टिकोण को प्राप्त कर सकती हैं।”
रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में गैर संक्रामक रोगों (एनसीडी) से हर साल 60 फीसदी मौतें होती हैं। इस कारण देश को साल 2030 तक 4580 अरब डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है।
रिपोर्ट में देश के खस्ताहाल स्वास्थ्य सूचकांक को दर्शाया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में जीवन प्रत्याशा (साल 2015 में 68 साल) ब्रिक्स देशों -ब्राजील, रूस, भारत तथा चीन में सबसे कम है।
ग्रामीण भारत में केवल 37 फीसदी लोगों को पांच किलोमीटर के दायरे में अस्पताल (इन-पेशेंट डिपार्टमेंट) की सुविधा उपलब्ध है और केवल 68 फीसदी मरीजों को आउट पेशेंट डिपार्टमेंट (ओपीडी) की सुविधा मिलती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिक्स देशों की तुलना में भारत में प्रति 10 हजार व्यक्ति पर सबसे कम संख्या में फिजिशियन हैं।
ऑर्गनाइजेशन ऑफ फार्मास्यूटिकल प्रॉड्यूसर ऑफ इंडिया (ओपीपीआई) के अध्यक्ष शैलेश अयंगर ने कहा, “भारत के स्वास्थ्य देखभाल को समग्र दृष्टिकोण और हमारी मौजूदा प्रणाली का गंभीरतापूर्वक आकलन करने की जरूरत है।”
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