नई दिल्ली, 25 नवंबर (आईएएनएस)। मशहूर लेखिका नयनतारा सहगल को यहां एक साहित्य महोत्सव में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। नेहरु-गांधी परिवार की सदस्य और देश में कथित असहिष्णुता के विरोध का चेहरा बनीं लेखिका ने सत्तारूढ़ सरकार पर जमकर निशाना साधा और कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ‘एक फासीवादी शासन’ है और अघोषित तानाशाही को लाने की कोशिश कर रही है।
नई दिल्ली, 25 नवंबर (आईएएनएस)। मशहूर लेखिका नयनतारा सहगल को यहां एक साहित्य महोत्सव में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। नेहरु-गांधी परिवार की सदस्य और देश में कथित असहिष्णुता के विरोध का चेहरा बनीं लेखिका ने सत्तारूढ़ सरकार पर जमकर निशाना साधा और कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ‘एक फासीवादी शासन’ है और अघोषित तानाशाही को लाने की कोशिश कर रही है।
सहगल ने टाइम लिटरेचर फेस्टिवल के पहले दिन कहा, “किसी भी नेतृत्व का यह कर्तव्य है कि वह अपने लोगों मे से सर्वश्रेष्ठ को सामने लेकर आए, लेकिन मौजूदा सरकार ने अपने लोगों में से सबसे खराब को लाना सुनिश्चित किया है। वे जानबूझकर भीड़ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।”
साल 1986 में अपने लोकप्रिय उपन्यास ‘रिच लाइक अस’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार जीत चुकीं लेखिका ने कहा कि हजारों सालों से भारतीय सभ्यता असहमति और तर्क के समर्थन में खड़ी हुई है।
उन्होंने कहा, “मैं इस बात का उल्लेख करना चाहूंगी कि असहमति अब सही शब्द नहीं है। असहमति जताने वाले लोगों को मारना, धमकाना असहिष्णुता नहीं है। यह हत्या है। हमने धार्मिक होने के बावजूद स्वतंत्रता के समय अपनी धार्मिक पहचान को ठुकरा दिया। हमने धर्मनिरपेक्ष बनना चुना क्योंकि भारत में हर धर्म को गौरव मिल सकता था, मुझे डर है कि अब ऐसा नहीं होने जा रहा।”
उन्होंने कहा कि हम अघोषित तानाशाही के अधीन है क्योंकि विचारधारा से असहमति जताने वाले हर शख्स को धमकाया जाता है और उसकी हत्या कर दी जाती है। यहां मुसलमानों और दलितों की बड़ी आबादी भय में रहती है। लेखिका ने कहा कि वह याद दिलाना चाहती हैं कि हम ऐसे समय में रह रहे हैं, जहां भारतीय ही भारतीय की हत्या कर रहे हैं।
सहगल ने संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर हो रहे विरोध के बारे में कहा कि अगर फिल्म रिलीज नहीं होती है, तो यह ‘भारतीय लोकतंत्र की हार’ होगी।
उन्होंने कहा कि कला और साहित्य भावनाओं से नहीं बंधे होते। हमारे पास 1.5 अरब लोग हैं और हमारे पास कई भावनाएं हैं।
उन्होंने बताया कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को पत्र लिखकर सलमान रुश्दी की किताब ‘सैटेनिक वर्सेज’ पर प्रतिबंध नहीं लगाने की गुजारिश की थी, लेकिन उनकी सलाह नहीं मानी गई।
लेखिका ने यह भी बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू किए जाने के दौरान उन्होंने साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर इसकी निंदा करने के लिए कहा था। लेकिन अकादमी काफी भयभीत थी, इसलिए उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।
सहगल ने दावा किया है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया समझौतावादी हो गई है या उनके शब्दों में कहे तो ‘राह से भटक गई है।’
लेखन क्षेत्र में योगदान देने के लिए सहगल को लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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