नवंबर में भारत लौटने की उम्मीद : करमापा

धर्मशाला, 31 जुलाई (आईएएनएस)। अमेरिका में शरण लेने की अटकलों पर विराम लगाते हुए तिब्बती धर्मगुरु व 17वें करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजी ने कहा कि उनके नवंबर में भारत लौटने की संभावना है। दोरजी की अमेरिका में चिकित्सा जांच हो रही थी।

आरएफए की तिब्बती सेवा के साथ सोमवार को एक साक्षात्कार में करमापा ने कहा, “मैं भारत जाऊंगा या नहीं, इस मुद्दे पर निजीतौर पर मुझे कोई संदेह या भ्रम नहीं है।” करमापा एक शरणार्थी के तौर पर 1999 में चीन से भारत आ गए थे।

उन्होंने कहा, “इससे पहले जून के अंत में वापस जाने की योजना थी। भारत जाने से पहले और बहुत जल्द मैंने भारत सरकार से बातचीत करने व स्पष्टीकरण जारी करने का विचार किया। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि मेरे यहां ठहरने को लेकर वहां बहुत-सी अफवाहें फैलाई जा रही हैं।”

तिब्बती बौद्ध धर्म की 900 साल की वंशावली का नेतृत्व करने वाले 32 साल के धर्मगुरु ने कहा, “यहां तक कि चीन जाने की भी कुछ अफवाहें फैलाई गई थीं। इसलिए, इन मामलों में स्पष्टीकरण की आवश्यकता थी और भारत सरकार के साथ बात कर अफवाहों को साफ करना जरूरी था।”

आरएफए की तिब्बती सेवा के साथ उनके साक्षात्कार के अनुसार, यह वार्ता मौजूदा समय में (भारत सरकार के साथ) चल रही है। इस साक्षात्कार का तिब्बती से अंग्रेजी में अनुवाद किया गया और करमापा के कार्यालय ने इसे आईएएनएस को मुहैया कराया।

उन्होंने कहा, “एक बार, यह वार्ता खत्म हो जाए और इसके नतीजे उपयोगी हों तो मैं भारत जाने के लिए तैयार हूं.. मैं सटीक तिथियों की पुष्टि नहीं कर सकता हूं। नवंबर में धर्मशाला में तिब्बती धार्मिक प्रमुखों के एक सम्मेलन की योजना है। मैं इसमें भाग लेना महत्वपूर्ण मानता हूं। इसलिए जब मैं उम्मीद कर रहा हूं तो मैं वापस जा सकता हूं।”

करमापा ने कहा कि यहां रहने का एक कारण विस्तृत स्वास्थ्य जांच और दूसरा भारत में रहने के 18 सालों के दौरान मैंने कोई छुट्टी नहीं ली। इसका मूल अर्थ है कि वह बौद्ध गतिविधि में जुटे रहे।

उन्होंने स्पष्ट किया, “अंदर व बाहर दोनों तरफ सभी प्रकार की चुनौतियों का सामना करने के कारण दिमाग व शरीर दोनों के साथ कुछ दिक्कतें थीं। इसलिए इस अवसर को छुट्टी की तरह लिया और दिमाग व शरीर दोनों को कुछ आराम दिया। इसी वजह से यहां लंबे समय तक रुका।”

करमापा ने तिब्बत से भाग कर जनवरी 2000 में भारत में शरण ली थी। तब से ज्यादतर वह धर्मशाला के निकट सिधबरी मठ में रहते थे।

उन्हें दलाई लामा व पंचेन लामा के बाद तीसरा सबसे महत्वपूर्ण तिब्बती धर्मगुरु माना जाता है।

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