काठमांडू, 10 जनवरी (आईएएनएस)। नेपाल के अपदस्थ नरेश ज्ञानेंद्र शाह ने रविवार को कहा कि उन्होंने भले ही अपनी गद्दी छोड़ दी है, लेकिन नेपाल और नेपाल की जनता की जिम्मेदारी उन्होंने नहीं छोड़ी है।
शाह ने राष्ट्रीय एकता दिवस 11 जनवरी से पूर्व यहां जारी एक बयान में कहा, “मैंने महल छोड़ा है, देश नहीं। मैंने राष्ट्रहित और जनता की खुशहाली, समृद्धि व संतुष्टि के लिए राज और महल छोड़ा। लेकिन लोगों को यह बात याद रखनी चाहिए कि मैंने अपना घर नहीं छोड़ा है और नेपाल व नेपाली जनता की जिम्मेदारी नहीं छोड़ी है।”
पहले राष्ट्रीय एकता दिवस आधुनिक नेपाल के निर्माता नरेश पृथ्वी नारायण शाह की जयंती, यानी पृथ्वी जयंती के रूप में मनाया जाता था।
पूर्व माओवादी विद्रोहियों के साथ एक शांति समझौते हेतु बातचीत के हिस्से के रूप में राजशाही खत्म करने का संसद में एक निर्णय हुआ था। इसके बाद ज्ञानेंद्र ने 11 जून, 2008 को अपनी पत्नी कोमल के साथ काठमांडू में स्थित शाही महल नारायण हिति को खाली कर दिया था।
नेपाल में उसके बाद आईं सरकारों ने ज्ञानेंद्र और उनके बड़े भाई नरेश बीरेंद्र की संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण शुरू कर दिया। नरेश बीरेंद्र की 2001 में हुए एक नरसंहार में हत्या कर दी गई थी। पूर्व साम्राज्य की संपत्तियों का प्रबंधन एक न्यास करता है।
ज्ञानेंद्र ने कहा, “यह समय की मांग है कि नेपाल की जनता किससे किस तरह की जिम्मेदारी, भूमिका और मदद चाहती है, उसका खुलासा किया जाए।”
जनता के सामने मौजूद कठिनाइयों पर पूर्व नरेश ने कहा, “नेपाल की जनता दो जून की रोटी और सामान्य जीवन के लिए संघर्ष कर रही है। यह चिंता का एक गंभीर विषय है।”
उन्होंने कहा, “देश में मौजूदा समय में कानून, भूगोल, शासन और प्रशासन के संबंध में जो भी झगड़े पैदा हुए हैं, यह सब अच्छा नहीं है।”
दक्षिणी मैदानी इलाके में मधेसी समुदाय द्वारा जारी विरोध प्रदर्शन के एक स्पष्ट संदर्भ में ज्ञानेंद्र ने सभी नागरिकों से सदियों पुराने सांप्रदायिक सौहाद्र्र को बनाए रखने का आग्रह किया।
ज्ञानेंद्र के बयान पर मिश्रित प्रतिक्रिया हुई है।
हिंदू समर्थक और राजशाही समर्थक पार्टी, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी-नेपाल ने कहा कि ज्ञानेंद्र का बयान जनता की इच्छाओं के अनुकूल है।
पार्टी के मुख्य सचेतक दिलनाथ गिरि ने बयान का स्वागत किया और कहा कि ज्ञानेंद्र का बयान जनता के मन की बात को जाहिर करता है।
लेकिन मुख्य वामदलों -सीपीएन-यूएमएल और यूसीपीएन-माओवादी -ने ज्ञानेंद्र के बयान की यह कहते हुए निंदा की है कि नेपाल में राजशाही की वापसी की कोई संभावना नहीं है।
सीपीएन-यूएमएल के सचिव योगेश भट्टराई ने कहा कि राजशाही के कारण नेपाल की बदनामी हुई और कोई इसे नहीं चाहता। “हमें विभिन्न कारणों से राजशाही की वापसी की संभावना नहीं दिखती।”
माओवादी नेता लीलामणि पोखरेल ने कहा कि राजनीतिक दलों को ज्ञानेंद्र के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए “ताकि वह दोबारा अपने सिर न उठा सके।”
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