हैदराबाद, 9 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर ने यहां शनिवार को कहा कि न्याय प्रणाली में सुधार के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति का काम जारी रहना चाहिए, क्योंकि नियुक्ति में विलंब से लोग न्याय के मौलिक अधिकार से वंचित हो जाएंगे।
उन्होंने कहा कि विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा 130 नाम सुझाए गए हैं, जिन पर न्याय मंत्रालय के साथ मिलकर विचार किया जा रहा है।
उन्होंने कहा, “मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूं कि न्याय मंत्री उस पर विचार करने जा रहे हैं, क्योंकि वे इस बात को महसूस करते हैं कि जब हम न्याय प्रक्रिया में सुधार को लेकर काम कर रहे हैं, तो नियुक्ति की प्रक्रिया का आगे बढ़ना जरूरी है, क्योंकि लोगों तक न्याय पहुंचाने को सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकार की पहचान दी है।”
राज्य कानूनी सेवा के 14वें अखिल भारतीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “न्याय पाना नागरिक का मौलिक अधिकार है और अगर आप न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करते हैं, तो आप वास्तव में लोगों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर रहे होते हैं, जो पूरी तरह अस्वीकार्य है।”
इस मौके पर केंद्रीय कानून व न्याय मंत्री डी.वी.सदानंद गौड़ा भी उपस्थित थे।
प्रधान न्यायाधीश की यह टिप्पणी उन रिपोर्टों के मद्देनजर आई है, जिसके मुताबिक न्यायाधीशों के चयन के लिए प्रक्रिया ज्ञापन में विवादास्पद अनुच्छेद को लेकर उनके नेतृत्व वाले कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए नामों पर सरकार व कॉलेजियम के बीच मतभेद उभरने के कारण नियुक्ति प्रक्रिया रोक दी गई है।
यह अनुच्छेद कॉलेजियम द्वारा राष्ट्रहित के मद्देनजर सुझाए गए नाम को खारिज करने का सरकार को अधिकार प्रदान करता है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्याय प्रणाली बेहद गंभीर दबाव में है और सरकार इस बात से अवगत है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालयों में 450 रिक्तियां हैं, जबकि इस साल 50 और रिक्तियां सामने आएंगी।
उन्होंने कहा कि नियुक्ति में देर इसलिए हो रही है, क्योंकि संविधान में संशोधन इसके आड़े आ रही है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “मुद्दे के समाधान के बाद कानून मंत्री ने महसूस किया कि प्रक्रिया ज्ञापन के संशोधन की प्रक्रिया में समय लगेगा, इसलिए मुझे एक पत्र लिखा गया कि सरकार पहले की प्रक्रिया के आधार पर ही नियुक्ति प्रक्रिया को शुरू करने के लिए इच्छुक है। हमने तत्काल सहमति दे दी और चार से छह सप्ताह के अंदर लगभग 163 नामों को मंजूरी दी गई, जो न्यायिक आयोग से संबंधित विवादों के कारण हमारे पास एक साल से अटके पड़े थे।”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि सिफारिशों के मुताबिक, उच्च न्यायालय में लगभग 90 नियुक्तियां स्थायी न्यायाधीश के रूप में होंगी और लगभग 40 नियुक्तियां ताजा होंगी, जबकि बाकी आगे होनी है।
बीते साल सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम पर रोक लगा दी थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम के साथ केंद्र द्वारा प्रक्रिया ज्ञापन तैयार करने पर सहमति जताई थी।
राष्ट्रीय कानून सेवा प्राधिकार (एनएलएसए) के संरक्षक न्यायाधीश न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि राज्य कानूनी सेवा के अधिकारी न्याय को लोगों तक पहुंचाने के सपने को सच करने में लगे हैं।
उन्होंने कहा, “एक साल की अवधि के दौरान, हमने लोक अदालतों में लंबित 62 लाख मामलों में फैसले दिए, मध्यस्थता की और 1.61 करोड़ मामले अदालत में हैं।”
इसे एक बड़ी उपलब्धि बताते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि इसने न्यायिक प्रणाली पर दवाब को कम किया।
उन्होंने कहा, “यदि कुल मामलों को जोड़ दें, तो इनकी संख्या 2.20 करोड़ हो जाएगी, अदालतें पूरी तरह जाम हो जाएंगी। हम पहले ही कह चुके हैं कि हमारे पास तीन करोड़ मामले लंबित हैं।”
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