पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ घटनाओं पर उठाए गए कदम : राष्ट्रपति (लीड-1)

आईजोल, 10 अप्रैल (आईएएनएस)। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शुक्रवार को यहां कहा कि केंद्र और दिल्ली सरकार ने पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ होने वाली अस्वीकार्य वारदातों को रोकने के लिए कदम उठाए हैं।

मिजोरम विश्वविद्यालय के 10वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि इस तरह की घटनाओं से देश की बहुलतावादी प्रकृति को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “कुछ समय पहले राजधानी दिल्ली में पूर्वोत्तर के नौजवानों पर हमलों की कई वारदातें सामने आईं।”

राष्ट्रपति ने कहा, “केंद्र और राज्य सरकार दोनों ने अभियुक्तों को केवल पकड़ने और दंडित करने की ही कार्रवाई नहीं की बल्कि कई कदम भी उठाए ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।”

उन्होंने कहा, “हमें यह अवश्य सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे देश की एकता और उसके बहुलतावादी चरित्र को इस तरह की अस्वीकार्य घटनाएं कमोजर न बनाएं।”

भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी एम.पी. बेजबरुआ के नेतृत्व में गृहमंत्रालय ने दिल्ली में पूर्वोत्तर के लोगों पर हो रहे हमलों पर एक समिति गठित की थी। इस समिति ने कहा था कि 2005 से 2013 के बीच दो लाख से अधिक लोग पूर्वोत्तर के राज्यों से दिल्ली आए हैं।

इसमें यह भी कहा गया है कि इनमें से 86 फीसदी लोगों को किसी न किसी तरह के नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा है।

शिक्षा पर राष्ट्रपति ने कहा कि विश्व के सर्वेक्षणों में शीर्ष 200 में भारत का एक भी संस्थान शामिल नहीं है।

उन्होंने कहा, “यह विडंबना है कि हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली जो कि विश्व स्तरीय विद्वान बनाने में सक्षम है उन्हें विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए खोते जा रहे हैं। इस प्रवृत्ति का मुकाबला करने के लिए गंभीर समीक्षा की आवश्यकता है।”

मिजोरम को प्राकृतिक सुंदरता का खजाना बताते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि अपने पश्चिम में बांग्लादेश और दक्षिण और पूर्व में म्यांमार के साथ तकरीबन 700 किलोमीटर अंतर्राष्ट्रीय सीमा के साथ मिजोरम महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति बनाए हुए है।

उन्होंने कहा कि यह खुशी की बात है कि मिजोरम विश्वविद्यालय को एनएएसी (राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद) ने 2014 में ‘ए’ श्रेणी की मान्यता दी थी।

राष्ट्रपति ने कहा, “उच्च शिक्षण संस्थान समाज के प्रेरणास्रोत होते हैं। इसे इस क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान करने के लिए सभी विशेषज्ञताओं का लाभ उठाना चाहिए।”

उन्होंने कहा, “कुलपतियों के सम्मेलन में यह फैसला हुआ था कि प्रत्येक केंद्रीय विश्वविद्यालय कम से कम पांच गावों को गोद लेगा और उनका विकास करेगा। मुझे भरोसा है कि यह विश्वविद्यालय उम्मीदों पर खरा उतरेगा।”

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