इंफाल, 23 मार्च (आईएएनएस)। सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून 1958 (एएफएसपीए) के खिलाफ आमरण अनशन कर अभियान चला रही इरोम शर्मिला अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करना चाहती हैं।
शर्मिला ने संवाददाताओं से बातचीत के दौरान मंगलवार को अपनी यह इच्छा जाहिर की। उन्हें किसी मामले के सिलसिले में इंफाल की अदालत में पेश करने के लिए लाया गया था।
विदित हो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश के दर्ज मामले में उन्हें 29 और 30 मार्च को दिल्ली की पटियाला हाऊस अदालत में हाजिर होना है।
शर्मिला ने कहा, “मैं प्रधानमंत्री से कहना चाहती हूं कि केवल बातचीत के जरिए ही सभी ज्वलंत समस्याएं सुलझ सकती हैं। इसके अलावा मैं भारत सरकार की आपत्तिजनक नीतियों का मुद्दा भी उनके समक्ष उठाना चाहती हूं।”
सन् 2006 के 6 और 7 अक्टूबर को शर्मिला ने दिल्ली स्थित जंतर मंतर पर अनशन किया था और दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। नतीजा है कि पटियाला हाऊस अदालत में उन्हें जब तब हाजिर होना पड़ता है।
यात्रा के लिए कोष की कमी के कारण शर्मिला दो बार पटियाला हाऊस अदालत में हाजिर नहीं हो सकीं। उनके साथ चिकित्सा, पुलिस और जेलकर्मियों को भी जाना पड़ता है।
पिछली दिल्ली यात्रा के दौरान भी शर्मिला ने प्रधानमंत्री से मिलने की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई और उन्हें इंफाल लौटना पड़ा।
अधिकारिक संकेतों के अनुसार प्रधानमंत्री कार्यालय से सकारात्मक जवाब नहीं भी मिल सकते हैं।
इसकी वजह यह हो सकती है कि शर्मिला की ओर से औपचारिक निवेदन नहीं भेजा गया है। दूसरी बात जो मांग शर्मिला कर रही हैं उस पर बातचीत करने को प्रधानमंत्री नहीं भी तैयार हो सकते हैं।
तीसरा शर्मिला खुद स्वीकार करती हैं कि उन्होंने काफी हद तक अपना जनाधार खो दिया है। अदालत परिसर में भी संवाददाताओं के अलावा उनका कोई समर्थक नहीं दिखा।
दरअसल शर्मिला इस मुद्दे पर सार्वजनिक चर्चा कराने को सोच रही हैं कि लोग एएफएसपीए चाहते हैं या नहीं और क्या उन्हें इस कानून के खिलाफ अभियान चलाना छोड़ देना चाहिए।
अगर लोग कानून का समर्थन करेंगे तो इस इलाके में उग्रवाद विरोधी ऑपरेशन के दौरान सैनिक कार्रवाई में जो जन धन की क्षति हुई है उसके दोष से सेना मुक्त हो जाएगी।
लोगों के विरोधाभाषी पक्ष प्रस्तुत करने से अधिकारी भी उलझन में हैं।
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