मुंबई, 26 जून (आईएएनएस)। महिलाओं को खतरे से बचाने के लिए भारत के गर्भपात कानूनों में तत्काल बदलाव की जरूरत है। मुंबई स्थित डॉक्टर ने पत्रिका ‘बीएमजे’ में दिए गए एक साक्षात्कार में यह बात कही।
मुंबई में क्लाउडनाइन ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स एंड लाइफवेव हॉस्पिटल में प्रसूति विज्ञान एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ के सलाहकार निखिल दतार ने कहा कि गर्भपात कानून में प्रस्तावित संशोधन विरोधाभासी हैं, जिनमें सुधार की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमपीटी) पारित कर भारत ने 1971 में गर्भपात को वैध कर दिया था। 20 सप्ताह तक के गर्भ के गर्भपात की अनुमति दी गई थी।
इस अधिनियम के मुताबिक, 20 सप्ताह बाद के भ्रूण को निकाले जाने पर पाबंदी है। हालांकि, यदि किसी महिला का जीवन खतरे में है तो ऐसी स्थिति में गर्भपात को मंजूरी है।
निखिल का विश्वास है कि कानून में संशोधन ही इस समस्या का एकमात्र वैधानिक समाधान है, लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में अधिनियम में किए गए दो प्रस्तावित बदलावों में त्वरित सुधार की जरूरत है।
पहले संशोधन में गैर-एलोपैथिक चिकित्सकों और नर्सो को भी गर्भपात करने में सक्षम होना चाहिए।
dharmpath.com dharmpath