ढाका, 2 मई (आईएएनएस)। एक समय अभाज्य भारतीय उपमहाद्वीप का हिस्सा रहे उन तमाम भूखंडों की साझा संस्कृति और साझा इतिहास के बारे में अधिक से अधिक जानने के लिए मैंने बांग्लादेश को चुना। यह मेरे लिए एक लिहाज से आसान चयन रहा।
ढाका, 2 मई (आईएएनएस)। एक समय अभाज्य भारतीय उपमहाद्वीप का हिस्सा रहे उन तमाम भूखंडों की साझा संस्कृति और साझा इतिहास के बारे में अधिक से अधिक जानने के लिए मैंने बांग्लादेश को चुना। यह मेरे लिए एक लिहाज से आसान चयन रहा।
आसान चयन इसलिए क्योंकि भारतीय सेना से मेरे परिवार के गहरे ताल्लुक के कारण मेरे लिए पाकिस्तान का वीजा हासिल करना मुमकिन नहीं था।
दोस्तों और परिजनों ने पाकिस्तान जाने को लेकर मुझे सवालिया निगाह से देखा और इसी कारण मैंने बांग्लादेश के वीजा के लिए आवेदन दिया। मुझसे सबसे पहले यह सवाल किया गया-बांग्लादेश क्यों?
मैंने कहा, “पर्यटन।”। वीजा अधिकारी मेरे जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखा लेकिन इसके बावजूद उसने मेरा वीजा पास कर दिया।
साल 2015 में शुरू अगरतला-ढाका बस सेवा को प्रतिदिन चलना था लेकिन यात्रियों की कम संख्या को देखते हुए इसे सप्ताह में तीन दिन चलाने का फैसला किया गया।
मैंने भूमार्ग से ढाका में प्रवेश करना का फैसला किया। इससे मुझे यहां की गर्मी के साथ तालमेल बनाने में मदद मिली। मैंने सीमा को पैदल ही पार किया।
भारत-बांग्लादेश सीमा वाघा बार्डर की तरह नहीं है। यहां सबकुछ शांत रहता है। मैंने बांग्लादेश में प्रवेश किया तो यह मुझे काफी हद तक भारत जैसा लगा।
मैंने आखौरा के लिए एक सीएनजी पकड़ी। बांग्लादेश में ऑटो रिक्शा को सीएनजी कहा जाता है। आखौरा से मैं बस से ढाका के लिए रवाना हुई।
मेरी ‘प्रथम श्रेणी बस’ में गर्मी और उमस का बोलबाला था। अगले दो दिन ढाका में बीते और ये किसी बुरे सपने की तरह रहे। यहां मेरा सामना जाने-पहचाने ट्रैफिक जाम से भी हुआ।
किसी तरह से मैं सोनारगांव (गोल्डन सिटी) जाने में सफल रही। यह ब्रिटिश काल में प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र हुआ करता था और इसका जिक्र इब्न-ए-बतूता और राल्फ फिच के यात्रा वृतांतो में भी मिलता है।
गोल्डन सिटी में ही पनामा सिटी है, जो यूरोपीय वास्तुशिल्प के प्रेरित 52 महलों से घिरा हुआ है। इनका निर्माण 19वीं शताब्दी में हुआ था। यहां कभी हिंदु कपड़ों के व्यापारी रहा करते थे।
आज लेकिन इस परिसर में शांति है और अधिकांश महलों में ताला लगा है। वर्ल्ड मान्यूमेंट फंड ने इसे 100 सबसे लुप्तप्राय स्थलों में शामिल कर रखा है।
इसके बाद मैंने लिबरेश्न वॉर म्यूजियम का रुख किया और इसके माध्यम से मैंने देखा कि किस तरह बांग्लादेश ने अपना स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और किस तरह से भारतीय सेना ने ‘मुक्ति वाहिनी’ नाम से मशहूर बांग्लादेश लिबरेशन आर्मी के साथ मिलकर 1971 में इस देश को स्वतंत्र कराया।
इस म्यूजियम का रखरखाव अच्छा नहीं है लेकिन इतिहास को संजोने की चाह में बांग्लादेश अब एक नया म्यूजियम बनवा रहा है।
अब मैंने देश के उत्तरपूर्व में स्थित सुंदर शहर सिल्हेत का रुख किया। यह पर्वतीय इलाका चाय के बागानों से घिरा है। इस शहर से बड़ी संख्या में बांग्लादेश विदेश गए हैं और वहीं रह रहे हैं। साथ ही ये इस देश की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान भी दे रहे हैं।
धार्मिक तौर पर यह शहर मुझे विविधता से भरा लगा। इस शहर में कई काली माता के कई मंदिर हैं और यहां की सड़कों पर काली माता और शंकर भगवान की मूर्तियां बेचते हुए देखी जा सकती हैं।
मैं ऐसे ही एक मंदिर में गई, जो किसी बख्तरबंद बंकर की तरह लगा। मुझे तुरंत अजनबी के तौर पर पहचान लिया गया। कुछ सवालात के बाद मुझे मुख्य पुजारी के कमरे में जाने की इजाजत मिल गई।
पुजारी ने कहा, “जब 1992 में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, जब हमारे मंदिर को भी जमींदोज कर दिया गया था। इस दौरान कई हिंदु भी मारे गए थे। हमने पैसे जमा करके फिर से इस मंदिर को बनाया। यहां लगे मजबूत राड इसकी सुरक्षा के लिए हैं।”
पुजारी ने कहा, “यहां रहने वाले हिंदु और मुसलमानों को हिंदी धारावाहिक और सिनेमा पसंद हैं लेकिन भारत में जब भी कुछ होता है तो उसका असर यहां भी दिखता है।”
धार्मिक और सामाजिक आधार पर भारत तथा बांग्लादेश काफी हक तक एक दूसरे से जुड़े हैं और आधुनिकता की दौड़ में भी दोनो ने एक साथ कदम बढ़ाया है।
बच्चु नाम के एक युवा ने कहा कि भारत में जब भी कोई दंगा होता है और किसी प्रकार का फसाद होता है तो यहां हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है।
एक मुख्य पर्यटन केंद्र होने के अलावा सिल्हेत 1971 के वॉर थिएटर का हिस्सा था। इस साल भारतीय वायु सेना ने यहीं से पहला हेलीबार्न ऑपरेशन किया था। यही वह स्थान है, जहां सिल्हेत की लड़ाई में गोरखा राइफल्स ने भारतीय सेना के लिए जंग जीती थी।
बांग्लादेश की मेरी यात्रा इतिहास के गरियारों में झांकने जैसा है। मैंने महसूस किया कि दोनों देश एक अदृश्य किंतु मजबूत धागे से बंधे हैं। दोनों देश एक दूसरे का हवाला देकर खुद को बयां करने की कोशिश करते हैं।
ढाका में बंगाली नया साल मनाने के बाद मैंने हिलसा का आनंद लिया और फिर इस देश को अलविदा कहा। मैं यहां दोबारा आना चाहूंगी।
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