देवारी नृत्य का प्रदर्शन आमतौर पर बुंदेलखंड में दशहरा से शुरू होता है और दीपावली के बाद तक चलता रहता है। देवारी नृत्य के कलाकार चटकीले रंगों से सजे-धजे, करतब दिखाते बांदा की गलियों में दिखाई देते हैं। इस नृत्य को बिना बोले समूह में किया जाता है। नृत्य के दौरान सभी कलाकारों के पैर-हाथ का समन्वय देखने लायक होता है।
बड़ोखर खुर्द के रमेश पाल (45) देवारी नृत्य को जीवित रखने और इसके संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। बुंदेलखंड के लोगों ने तो देवारी नृत्य को भूला ही दिया था। लेकिन रमेश पाल ने इस विधा को फिर से जिंदा किया है। वह खुद तो नृत्य कर ही रहे हैं, भविष्य के लिए बच्चों को भी इस कला का प्रशिक्षण दे रहे हैं।
रमेश पाल का सपना है कि वह इस कला को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाएंगे। वह कहते हैं, “जब मुझे पता चला कि संस्कृति मंत्रालय लोक नृत्यों को बढ़ावा दे रहा है और देश के अलग-अलग प्रदेशों में अपने नृत्य को दिखाने का मौका देता है, तो मैंने भी खूब मेहनत कर यह अवसर प्राप्त किया। आज मैं लखनऊ, बनारस़, दिल्ली जैसे शहरों में नृत्य दिखाने जाता हूं।”
पाल शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि वह गांव-गांव पैदल और साइकिल से घूम-घूमकर लोगों को नृत्य दिखाते थे। उन्होंने इस नृत्य विधा को आगे बढ़ाने के लिए चार साल कड़ी मेहनत की और आज उसका नतीजा है कि सब उन्हें देवारी नृत्य के नाम से जानते हैं।
रमेश की देवारी नृत्य मंडली में 100 सदस्य हैं और ये सभी पढ़ाई के साथ देवारी नृत्य सीखने का काम करते हैं। इन्ही में से एक सदस्य प्रदीप(10) कहते हैं, “मैं पढ़ाई के साथ यह नृत्य भी सीखता हूं।”
बीए के विद्यार्थी सुनील (19) यह नृत्य सीखने के लिए तड़के चार बजे उठते हैं। पहले एक घंटा पढ़ाई और उसके बाद देवारी नृत्य का अभ्यास करते हैं। सुनील देवारी नृत्य के जरिए बुंदेलखंड का नाम रोशन करना चाहते हैं। रमेश (19) के सपने भी सुनील की ही तरह हैं।
कंधी (70) देवारी नृत्य में ढोलक बजाने का काम करते हैं और उन्होंने यह काम अपने पिताजी से सीखा है। वह कहते हैं, “बचपन में मैं अपने पिताजी के साथ जाता था और धीरे-धीरे मैं खुद ढोलक बजाने लगा।”
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