नई दिल्ली, 26 मई (आईएएनएस)। सरकार द्वारा दोहरे कर परिहार समझौते (डीटीएए) वाले देशों के साथ कर व्यवस्था सुधारने की कवायद के बीच भारतीय उद्योग जगत ने आयकर विभाग से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि भारतीय कंपनियों पर दोहरे कराधान की मार न पड़े।
एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) ने एक बयान में कहा, “विभिन्न देशों द्वारा अपनाए जाने वाले एकाउंटिंग के अलग-अलग तौर-तरीकों के कारण भारतीय करदाताओं पर दोहरे कराधान की मार पड़ सकती है।”
एसोचैम ने कहा कि उसने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को एक प्रस्तुति देकर प्रस्तावित विदेशी टैक्स क्रेडिट (एफटीसी) नियमों में बदलाव कर यह सुनिश्चित करने की सलाह दी है कि भारतीय करदाताओं के साथ आय पर दोहरे कराधान जैसी बात न हो।
बयान में कहा गया है, “प्रत्यक्ष कर पर एसोचैम के राष्ट्रीय परिषद के अध्यक्ष राजेश गर्ग के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने हाल में सीबीडीटी सदस्य रानी सिंह नैयर से मुलाकात की और उनके साथ इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा की थी”
एसोचैम ने कहा है कि संभव है कि शुरुआती वर्षो में एफटीसी भारतीय करों से अधिक हो, लेकिन बाद के वर्षो में भारतीय कर एफटीसी से अधिक हो जाएगा।
बयान के मुताबिक, “ऐसी स्थिति में जब विदेशी कर भारतीय कर से अधिक होगा, तब यदि बाद के वर्षो में कैरी फॉरवर्ड की अनुमति नहीं होगी, तो कंपनियों को अधिक कर देना पड़ेगा।”
एसोचैम ने कहा कि विभिन्न देशों की लेखापरीक्षा प्रणली भी अलग-अलग हो सकती है।
बयान में कहा गया है, “उदाहरण के लिए स्रोत देश नकद आधारित लेखापरीक्षा प्रणाली अपना सकता है, जबकि भारत में एक्रुअल आधारित प्रणाली अपनाई जाती है। इस हिसाब से विदेशी आय पर प्रथम वर्ष में कर लग सकता है, जबकि चौथे साल में इस पर स्रोत देश द्वारा कर लगाया जा सकता है।”
बयान में आगे कहा गया है, “इस मुद्दे के समाधान के लिए नियमों में कैरी फॉरवार्ड का प्रावधान किया जाना चाहिए और स्थिति विशेष में एफटीसी का दावा करने के लिए पिछले वर्षो के कर रिटर्न संशोधन के लिए समय सीमा में यथोचित सुधार किया जाना चाहिए।”
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