‘भाषाओं को अपनाने से बंगाल की संस्कृति समृद्ध होगी’

कोलकाता, 17 जून (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा स्कूली शिक्षा में बंगाली भाषा को अनिवार्य करने और फिर उसे वापस लेने के फैसले से दार्जिलिंग में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) को ताजा आंदोलन खड़ा करने का बड़ा मौका मिल गया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह फैसला राज्य के सांस्कृतिक परिवेश को समृद्ध करने में मददगार साबित होगा, बशर्ते बंगालियों को अन्य भाषाओं को सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए।

कोलकाता, 17 जून (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा स्कूली शिक्षा में बंगाली भाषा को अनिवार्य करने और फिर उसे वापस लेने के फैसले से दार्जिलिंग में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) को ताजा आंदोलन खड़ा करने का बड़ा मौका मिल गया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह फैसला राज्य के सांस्कृतिक परिवेश को समृद्ध करने में मददगार साबित होगा, बशर्ते बंगालियों को अन्य भाषाओं को सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा तीन भाषा सूत्र (टीएलएफ) के तहत आईसीएसई व सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूलों सहित राज्य की 10वीं कक्षा तक के सभी स्कूलों में बंगाली भाषा को अनिवार्य करने की घोषणा से जीजेएम को उत्तरी बंगाल के पहाड़ी इलाकों में नए राज्य के आंदोलन को फिर से शुरू करने का एक मौका मिल गया। जीजेएम ने ममता की घोषणा के बारे में कहा कि ‘बंगाली भाषा थोपी’ जा रही है।

बंगाली भाषा को अनिवार्य करने के फैसले की घोषणा के बाद ममता ने तुरंत अपना रुख बदलते हुए कहा कि दार्जिलिंग, दोआर (हिमालय की तलहटी) इलाका तथा तराई (पहाड़ के समीप मैदानी इलाके) के कुछ खास स्कूलों में बंगाली भाषा पढ़ाने को अनिवार्य करने से छूट दी जाएगी।

लेकिन तब तक उनकी पहली घोषणा की चिंगारी आग का रूप धर चुकी थी, जिसने पूरे दार्जिलिंग को अपनी चपेट में ले लिया। जीजेएम ने क्षेत्र के लोगों की नस को मजबूती से पकड़ने के लिए भावनात्मक मुद्दे का इस्तेमाल किया।

प्रख्यात भाषाविद् तथा जनजाति अधिकार कार्यकर्ता गणेश देवी ने कहा कि समृद्ध भाषाई मेल तथा संस्कृति-संक्रमण के संरक्षण के लिए भाषा की व्यापकता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए न कि समानता पर।

उस इलाके (उत्तरी बंगाल) में लेपचा भाषा को मान्यता दिलाने के लिए लंबे समय से आंदोलन हो रहा है, जिसके मुताबिक उत्तर बंगाल में भाषा से संबंधित अशांति कोई नई घटना नहीं है।

देवी ने आईएएनएस से कहा, “अब स्कूली स्तर पर पढ़ाई में यह सुधार राज्य की संरचनात्मक जरूरत हो सकती है, लेकिन राज्य को याद रखना होगा कि जब भी भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ है, तब मूल सिद्धांत भाषाई विविधता रही है न कि भाषाई समानता को थोपना।”

उन्होंने कहा, “यह भाषाई राज्यों के गठन की भावना के खिलाफ है। सरकार तकनीकी तौर पर सही है, लेकिन ऐतिहासिक तौर पर गलत।”

नेपाली भाषा अध्ययन विशेषज्ञ कबिता लामा को बंगाली भाषा को अनिवार्य करने के पीछे कोई तर्क नजर नहीं आता, क्योंकि स्थानीय लोग पहले से ही बंगाली भाषा में निपुण हैं।

सिक्किम यूनिवर्सिटी में नेपाली स्कूल ऑफ लैंग्वेज एंड लिटरेचर विभाग में सहायक प्रोफेसर लामा ने कहा, “हम गोरखा लोग बंगाली साहित्य तथा समुदाय का बेहद सम्मान करते हैं और उनके खिलाफ नहीं हैं, लेकिन गोरखा छात्रों के लिए नेपाली भाषा ज्यादा जरूरी है। हम बंगाली भाषा बोलते हैं और बंगाली लोग भी हमारी भाषा बोलते हैं। कोई चाहे जिस भाषा में बोले, अहसास दिल से आात है।”

वहीं, दूसरी तरफ प्रख्यात शिक्षाविद् तथा भाषाविद् पबित्र सरकार को लगता है कि बंगाली भाषा को वैकल्पिक बनाने से सरकार की घोषणा में जो ठसक थी, वह दूर हो सकती है।

सरकार ने कहा, “मुझे नहीं पता कि फैसले का अंतत: क्या असर होगा, क्योंकि जैसे ही इसे वैकल्पिक बनाया जाएगा, फैसले की ठसक कम हो जाएगी। दक्षिण बंगाल में जहां भी संथाल जनजाति हैं, वहां भाषा का थोपना कोई मुद्दा नहीं है, क्योंकि वे अपनी ऐच्छिक लिपि के अलावा बंगाली भाषा भी सीख रहे हैं। यह सामंजस्यपूर्ण संबंध है।”

प्रवास अध्ययन विशेषज्ञ समीर दास ने चिंता जताई कि बंगाली भाषा को अनिवार्य करने से प्रवासी समुदायों (खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान) को परेशानी हो जाएगी।

दास ने आईएएनएस से कहा, “मुझे नहीं लगता कि यह एक बड़ी समस्या है। यह बंगाल में विभिन्न समुदायों को एकजुट करने में योगदान करेगा।”

उन्होंने कहा, “अगर आप तीसरी भाषा के रूप में कुछ बोलते हैं, तो यह सर्वविदित है कि वह साहित्यिक नहीं होगा। इसलिए गैर बांग्लाभाषी छात्र जो बंगाली का अध्ययन करेंगे वे उसे कामकाज की भाषा के तौर पर इस्तेमाल करेंगे। उन्हें बंगाली भाषा की गूढ़ता को सीखने की जरूरत नहीं है।”

उन्होंने कहा, “बंगाल में प्रवासी समुदाय पहले से ही बंगाली जानते हैं। अब अगर इस अनौपचारिक संरचना को संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बना दिया जाएगा तो क्या होगा।”

आईसीएसई के मुख्य कार्यकारी तथा सचिव गैरी अराथून ने कहा कि तब तक कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए, जबतक कि छात्र बोर्ड की परीक्षा में लिखने के लिए तीसरी भाषा का चयन नहीं करते हैं।

सरकार के मुताबिक, वार्ता दोतरफा होनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “अगर गैर-बंगाली समुदाय बंगाली सीखने को इच्छुक हैं, तो बंगालियों को भी अन्य भाषाओं को सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए। राज्य की भाषा सीखने का मतलब है कि आप राज्य के लोगों व संस्कृति को अपना रहे हैं। यह अन्य समुदायों को बंगाली साहित्य व संस्कृति में योगदान के लिए प्रोत्साहित करेगा।”

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