भ्रष्टाचार निवारक विधेयक को मंत्रिमंडल की मंजूरी

नई दिल्ली, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को भ्रष्टाचार निवारक (संशोधन) विधेयक-2013 को संसद में पेश किए जाने को मंजूरी दे दी। इसका मकसद अधिकारियों के मन से बेहतर इरादे से लिए गए अपने फैसले के लिए भविष्य में प्रताड़ित किए जाने के डर को हटाना, लेकिन रिश्वत के लिए अधिक कठोर सजा का प्रावधान करना है।

विधेयक में भ्रष्टाचार को नए तरीके से परिभाषित किया गया है और रिश्वत लेने और देने वाले के लिए कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। व्यक्ति के अलावा इसके दायरे में कंपनियों को भी लाया गया है।

भ्रष्ट गतिविधि के लिए न्यूनतम कारावास को छह महीने से बढ़ाकर तीन साल और अधिकतम कारावास अवधि को पांच साल से बढ़ाकर सात साल किए जाने का प्रावधान किया गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की हुई बैठक के बाद एक आधिकारिक बयान में कहा गया, “सात साल का कारावास भ्रष्टाचार को जघन्य की श्रेणी में लाता है।”

संशोधन के बाद कानून भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र समझौते के अनुरूप हो जाएगा।

विधेयक में अधिकारियों की सुरक्षा के लिए यह प्रावधान किया गया है कि भ्रष्टाचार के इरादे के आरोप को अभियोजन पक्ष द्वारा साबित करना होगा।

गत सप्ताह केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भ्रष्टाचार निवारक कानून में पूर्ण संशोधन की जरूरत बताते हुए कहा था कि 27 साल पुराना यह कानून ईमानदारी से फैसला लेने की राह में बाधक है और इसमें भांति-भांति प्रकार से व्याख्या के लिए कई गुंजाइश खुली छोड़ दी गई है।

जेटली ने कहा, “क्या 1988 का कानून भ्रष्टाचार और ईमानदारी से लिए गए फैसले में हुई भूल के बीच फर्क कर सकता है?”

उन्होंने कहा, “1988 का कानून परीक्षा पर खरा नहीं उतर पाया है।” खास कर यह कानून अलग-अलग तरीके से व्याख्या किए जाने के लिए खुला हुआ है और इसमें भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की अलग-अलग तरीके से व्याख्या करने की गुंजाइश छोड़ दी गई है।

नए विधेयक में इसे सुधारने की कोशिश की गई है।

विधेयक 19 अगस्त, 2013 को राज्यसभा में पेश किया गया था। इससे संबंधित संसद की स्थायी समिति ने अगले वर्ष छह फरवरी को इसपर अपनी रपट जमा की। इसमें कानून आयोग की राय भी शामिल की गई थी। विधेयक हालांकि पारित नहीं किया जा सका।

विधेयक के मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं :

– संपत्ति जब्ती का अधिकार जिला अदालत की जगह निचली अदालत को।

– वाणिज्यिक संगठनों द्वारा सरकारी अधिकारी से संबंध रखने के बारे में दिशानिर्देश जारी किए जाने की व्यवस्था।

– सुनवाई मौजूदा आठ साल की जगह दो साल में पूरी किए जाने का प्रावधान।

– सरकारी अधिकारियों द्वारा इरादतन रिश्वत लेने को अपराध का दर्जा।

– बेहिसाबी संपत्ति रिश्वत लिए जाने का प्रमाण।

– और मौद्रिक या गैर मौद्रिक दोनों तरह के रिश्वत को कानून के दायरे में लाया गया।

About admin


Notice: ob_end_flush(): Failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home4/dharmrcw/public_html/wp-includes/functions.php on line 5493