इंफाल, 13 मार्च (आईएएनएस)। स्थाई रूप से संघर्षरत राज्य की छवि से निजात पाने के लिए सीमावर्ती पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के अनेक स्वयंसेवी संगठन और निजी रूप से कई लोग पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए राज्य की पारंपरिक संस्कृति और जीवन शैली को प्रदर्शित कर उसे संरक्षित और प्रोत्साहित करने के प्रयास कर रहे हैं।
इंफाल, 13 मार्च (आईएएनएस)। स्थाई रूप से संघर्षरत राज्य की छवि से निजात पाने के लिए सीमावर्ती पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के अनेक स्वयंसेवी संगठन और निजी रूप से कई लोग पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए राज्य की पारंपरिक संस्कृति और जीवन शैली को प्रदर्शित कर उसे संरक्षित और प्रोत्साहित करने के प्रयास कर रहे हैं।
अधिकारियों के मुताबिक गत नवंबर में इंफाल में हुए वार्षिक पर्यटक महोत्सव के दौरान उत्सव स्थल पर राज्य के अधिकांश समुदायों और जनजातियों के पारंपरिक घर बनाए गए थे जिसे अब राज्य सरकार संरक्षित रखना चाहती है। राज्य में तेजी से हो रहे शहरीकरण के चलते अब पूरे मणिपुर में कहीं भी लकड़ी और बांस से बने पारंपरिक घर नहीं दिखते हैं, क्योंकि लोगों में आधुनिक घरों की ललक तेजी से बढ़ रही है। जनजातीय समाज में इन पारंपरिक घरों को सजाने के लिए शिकार किए गए जानवरों की खोपड़ी और उनके सींगों का प्रयोग किया जाता है। अब उत्सव स्थल पर बने इन पारंपरिक घरों को अगली पीढ़ी के लिए संरक्षित किया जाएगा।
राज्य सरकार ने धार्मिक स्थल चिनगोई बरुनी को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने वादा किया था, लेकिन उसने इस संदर्भ में कुछ भी नहीं किया। इस पर तृणमूल कांग्रेस के विधायक थाऊनाओजाम श्याम कुमार ने कहा कि वह इस स्थल को अपने दम पर विकसित करेंगे।
उन्होंने कहा, “सरकार ने इस स्थल को विकसित करने के लिए कोई राशि नहीं दी। लेकिन, आम लोगों ने मदद का आश्वासन दिया है और अब इस जगह को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना आसान हो जाएगा।”
सिर्फ श्याम कुमार ही नहीं बल्कि ऐसे कई लोग हैं जो निजी स्तर पर प्रयास कर पर्यटकों के लिए अपनी पारंपरिक संस्कृति को संरक्षित एवं प्रदर्शित कर रहे हैं।
मोतुआ बहादुर (55) ने इंफाल में अपना निजी संग्रहालय खोला है जिसमें राज्य की अनोखी चीजें रखी गईं हैं। यह संग्रहालय पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है।
इसी तरह एक स्वयंसेवी संगठन उकाल (यूकेएएल) है जो पौराणिक और धार्मिक मामले में समाज के प्रहरी का काम कर रहा है। हाल में इस संस्था ने घाटी में रहने वाले लोगों के एक हिस्से को पूजा के दौरान ‘भद्दे नृत्य और संगीत का इस्तेमाल करने के लिए’ कड़ी फटकार लगाई थी।
संस्था का मानना है कि इस तरह के ‘नीच प्रचलन’ से गंभीर सोच वाले ऐसे पर्यटकों की इस राज्य में रुचि कम हो जाएगी जो यहां की पारंपरिक धार्मिक आनुष्ठानिक क्रियाएं देखना चाहते हैं।
18 वीं सदी में मणिपुर घाटी में रहने वाले लोगों को जबरन वैष्णव बना दिया गया था, लेकिन अब भी अधिकांश लोग अपने आदिम देवताओं की पूजा करते हैं। वैष्णव होने के बाद यहां ज्यादतर लोग शाकाहारी बन गए, पर कुछ अब भी मछली खाते हैं।
मणिपुर की महिलाएं पाकशास्त्र में माहिर हैं। वे सुगंधित और स्वादिष्ट जड़ी बूटियों, जड़ों और पौधों से लाजवाब मणिपुरी व्यंजन बनाती हैं। बाजार में बिकने वाले आधुनिक मसाले अब भी अधिकांश गृहणियों के लिए नए ही हैं।
मणिपुर में काला चावल खाया जाता है। यह दुनिया में और कहीं नहीं पाया जाता। इस चावल से पर्यटकों के लिए खास तरह के पकवान बनाए जाते हैं।
30 साल पहले तक मणिपुर के होटलों में केवल शाकाहारी भोजन ही परोसे जाते थे और रसोइए सिर्फ ब्राह्मण ही होते थे क्योंकि वैष्णव लोग गैर ब्राह्मणों के हाथों के बने भोजन नहीं खाते थे।
लेकिन, राज्य की नई पीढ़ी बाहरी दुनिया के संपर्क में आने के चलते दृढ़ता से वैष्णव आचार संहिता का पालन नहीं करती है। वे अब भोजन से पहले स्नान करने की परंपरा का पालन नहीं करते हैं।
राज्य में पुरानी परंपराओं के दिन खत्म होते जा रहे हैं। वैष्णव मत की पकड़ कमजोर हो गई है। मांस की दुकानों पर महिलाओं और लड़कियों की भीड़ देखी जा सकती है। इतना ही नहीं अब तो वृद्ध महिलाएं अंडे भी बेचती हैं। अधिकांश रेस्टोरेंट में अब मांसाहारी भोजन ही मिलता है। अब वह बात नहीं रही कि कुछ दशकों पहले बच्चे घर से काफी दूर जाकर ऑमलेट बना कर खाते थे और बिना स्नान किए घर नहीं लौट सकते थे।
फिर भी, मणिपुर के इस्कॉन और अन्य मंदिरों में पारंपरिक शादियों, श्राद्ध कर्म देखने की छूट पर्यटकों व उनके गाइडों को है जहां वे राज्य के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लेते हैं। मंदिर में 1500 लोगों की बैठने की क्षमता है। यहां पर्यटक 25 प्रकार के शाकाहारी व्यंजनों का मजा ले सकते हैं।
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