बहुमुखी प्रतिभा की धनी तमिल अभिनेत्री मनोरमा का स्ट्रीट आर्टिस्ट से लेकर सर्वाधिक प्यार और सम्मान पाने वाली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री बनने का सफर भारतीय सिनेमा की सर्वाधिक प्रेरणादायक कहानियों में से एक के रूप में याद किया जाएगा।
बहुमुखी प्रतिभा की धनी तमिल अभिनेत्री मनोरमा का स्ट्रीट आर्टिस्ट से लेकर सर्वाधिक प्यार और सम्मान पाने वाली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री बनने का सफर भारतीय सिनेमा की सर्वाधिक प्रेरणादायक कहानियों में से एक के रूप में याद किया जाएगा।
मनोरमा (78) को एक ऐतिहासिक हास्य अभिनेत्री के स्तर पर पहुंचने और दक्षिण भारत में घर-घर में पहचाना जाने वाला नाम बनने में 50 साल लगे। 1937 में तमिलनाडु के तंजावुर जिले के राजमन्नार्गुदी शहर में जन्मीं मनोरमा के बचपन का नाम गोपीशांता था।
प्रशंसक उन्हें प्यार से ‘आची’ बुलाते हैं। उन्होंने रविवार को चेन्नई में एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। उनके निधन से फिल्मोद्योग शोक में डूब गया है।
उनके परिवार में अभिनेता-गायक बेटे बूप्ति हैं।
मनोरमा ने अपना करियर बतौर स्ट्रीट गायिका शुरू किया और कभी-कभी रंगमंच कर्मियों के लिए गाया। ऐसे ही एक शो के दौरान उनका नाम मनोरमा पड़ गया और वह मंच पर अभिनय करने को मजबूर हो गईं, क्योंकि अभिनेत्री ने अपनी भूमिका निभाने से इंकार कर दिया था।
जल्द ही वह एस.एस. राजेंद्रन की ‘नाटक मंद्रम’ से जुड़ गईं और यहीं उन पर गीतकार कन्नदासन की निगाह पड़ी, जिन्होंने उन्हें तमिल फिल्म ‘मलयित्ता मंगै’ (1958) में लिया। मनोरमा को शुरुआत में एक हास्य अभिनेत्री की भूमिका निभाने में झिझक हुई, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
मनोरमा ने फिल्मों में अपनी जोशीली प्रस्तुति के जरिए दर्शकों से खूब प्यार पाया और थान्गावेलु, थेंगाई श्रीनिवासन, छो और नागेश सरीखे दिग्गज अभिनेताओं के साथ काम किया।
1963 में उन्होंने तमिल फिल्म ‘कुंजुम कुमारी’ से मुख्य अभिनेत्री के रूप में अपनी पारी शुरू की।
दो साल बाद वह ए.पी. नागराजन निर्देशित तमिल फिल्म ‘थिरुविलायादल’ और एक साल बाद दोबारा नागराजन निर्देशित ‘सरस्वती सबथम’ में नजर आईं।
नागराजन ने 1968 में तमिल फिल्म ‘थिल्लाना मोहनम्बल’ में मनोरमा के अभिनय कौशल का बखूबी प्रयोग किया और उनकी ‘जिल जिल रमामणि’ की भूमिका ने उनका स्टार का दर्जा बुलंद किया।
मनोरमा ने आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, “जिल जिल एक ऐसी भूमिका है, जिससे मुझे प्यार हो गया। बीते वर्षो में मैं इसकी मुरीद हो गई हूं। यह बहुत खास है, क्योंकि इसे आज भी हर कोई याद करता है।”
मनोरमा की गायकी से पहली मुलाकात संगीत निर्देशक एम.ए. कुमार ने कराई। तमिल फिल्म ‘मगले उ समथु’ (1964) में उन्होंने पाश्र्व गायिका ए.आर. एस्वरी के साथ मिलकर ‘तथा तथा पीढी कुडू’ गाना गाया।
उन्होंने करीब 60 फिल्मों में गाने गाए। उनकी समकालीन अभिनेत्रियों में से कोई भी ऐसा नहीं कर सकीं।
उनकी सर्वश्रेष्ठ तमिल फिल्मों में ‘अंबे वा’, ‘एथिर निचल’, ‘गलत्ता कल्याणम’, ‘चित्तूकुरुवी’, ‘दुर्गा देवी’, ‘अन्नलक्ष्मी’ और ‘इमायम’ सहित अन्य शामिल हैं।
वहीं, तेलुगू में उन्होंने ‘रिक्शावोदु’, ‘कृष्णार्जुन’ और ‘सुबोधयम’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया।
1974 में वह हिंदी फिल्मों के मशहूर हास्य अभिनेता महमूद के साथ ‘कुंवारा बाप’ फिल्म में नजर आईं, जिसमें उन्होंने अपने संवाद खुद डब किए।
कलाइमामणि पुरस्कार प्राप्तकर्ता मनोरमा तमिल फिल्म ‘पुढ़ी पाड़ै'(1989) के लिए सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजी गईं।
उन्हें 2002 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी आखिरी फिल्म सूर्या अभिनीत ‘सिंघम 2’ थी।
कुछ माह पहले उनके निधन की अफवाहें फैली थीं, जिनका खंडन करते हुए उन्होंने कहा था कि वह एकदम स्वस्थ हैं और तीन फिल्में भी साइन की हैं। प्रशंसकों को उन्हें फिर से पर्दे पर देखने की उम्मीद बंधी थी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
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