नई दिल्ली, 29 नवंबर (आईएएनएस)। हिंदू दक्षिणपंथी समूहों द्वारा हमलों के बाद लिखना बंद कर चुके तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन की ओर से पुरस्कार लेना बेहद तकलीफदेह है। यह कहना है उनके प्रकाशक का।
साहित्यिक पुरस्कार ‘समन्वय भाषा सम्मान’ ग्रहण करने के बाद प्रकाशक कनन सुंदरम ने शनिवार को कहा, “अगर सामान्य परिस्थिति में उन्होंने मुझे अपनी तरफ से यह पुरस्कार ग्रहण करने को कहा होता तो मैं इसे अपना सौभाग्य समझता।”
सुंदरम ने कहा, “आज भले ही यह निश्चित तौर पर गौरव की बात है, लेकिन यह तकलीफदेह स्मृति है। यह याद दिलाता है कि अब मुझे पेरुमल मुरुगन ‘थे’ कहना पड़ता है, हालांकि वे आज भी ‘हैं’।”
मुरुगन को अपने उपन्यास ‘मदोरुभागन’ के लिए यह पुरस्कार दिया गया है।
उनकी किताब का इस वर्ष हिंदू संगठनों द्वारा विरोध किए जाने के बाद उन्होंने बतौर लेखक खुद को मृत घोषित कर दिया था।
पुरस्कार समारोह में न आकर मुरुगन ने पी. मुरुगन के नाम से हस्ताक्षरित एक संदेश के माध्यम से कहा है कि अब वह केवल लेखक पेरुमल मुरुगन की परछाई के रूप में काम कर रहे हैं।
प्रकाशक संस्थान ‘कलचुवदु पथीप्पगम’ के संस्थापक सुंदरम ने कहा, “अगर मुरुगन खुद एक परछाई हैं तो मैं खुद को एक प्रेत के अंग के समान महसूस कर रहा हूं। जब मैंने बहुसंख्यक माफियाओं की हरकतें देखी तब मेरे भीतर प्रतिक्रिया हुई, लेकिन पेरुमल मुरुगन की अनुपस्थिति में मैंने खुद को रोक लिया था।”
मुरुगन के एक नजदीकी मित्र सुंदरम ने कहा कि पिछले साल से मुरुगन की ओर से आईं टिप्पणियों से वह दुखी हैं।
सुंदरम ने कहा, “ऐसे देश में रहने पर, जहां आहत लोगों की संख्या किताब पढ़ने वालों से अधिक है, मुझे लगता है कि बतौर प्रकाशक और बतौर नागरिक दोनों स्तरों पर मेरी स्थिति खराब है।”
सुंदरम ने कहा, “बतौर प्रकाशक मैं तभी पूर्ण हो सकता हूं, जब मैं पेरुमल मुरुगन और कई अन्य साहसी लेखकों का लेखन बिना किसी तब्दीली के मूल रूप में प्रकाशित कर पाऊं।”
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