नई दिल्ली, 5 दिसम्बर (आईएएनएस)। पूर्वोत्तर भारत और साथ ही म्यांमार और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में तीन वर्षो के व्यापक शोध के बाद लिखी गई एक किताब राजनीतिक निर्णय लेने में (खासतौर पर संघर्ष प्रभावित इलाकों में) महिलाओं की भूमिका का गहराई से विश्लेषण करती है।
नई दिल्ली, 5 दिसम्बर (आईएएनएस)। पूर्वोत्तर भारत और साथ ही म्यांमार और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में तीन वर्षो के व्यापक शोध के बाद लिखी गई एक किताब राजनीतिक निर्णय लेने में (खासतौर पर संघर्ष प्रभावित इलाकों में) महिलाओं की भूमिका का गहराई से विश्लेषण करती है।
किताब, ‘वेयर आर ऑवर वूमेन इन डिसीजन मेकिंग?’ में महिलाओं और शांति व सुरक्षा पर अक्टूबर 2000 में अपनाए गए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ऐतिहासिक संकल्प 1325 से प्रेरित निबंध, लेख, संस्मरण और कहानियां संकलित हैं।
कंट्रोल आर्म्स फाउंडेशन ऑफ इंडिया (सीएएफआई) की महासचिव बिनलक्ष्मी नेपरम द्वारा संपादित और भारत में यूरोपीय संघ प्रतिनिधिमंडल के राजनीतिक खंड के प्रमुख फ्रेडरिक शंपा द्वारा जारी की गई किताब में महिलाओं की शांति और सुरक्षा और राजनीतिक निर्णय लेने में महिलाओं की भूमिका पर राष्ट्रीय कार्य योजना के रूप में सिफारिशें भी की गई हैं।
किताब के लिए शोधकर्ताओं ने महिला नेताओं की पहचान और उन्हें यूएनएससी संकल्प 1325 समझने में मदद के लिए आठ पूवरेत्तर राज्यों -अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा और म्यांमार में शान राज्य और बांग्लादेश में चटगांव हिल ट्रैक्ट (सीएचटी) का दौरा किया।
नेपरम ने आईएएनएस को बताया, “हमारे काम के दौरान हमें बेहद आश्चर्यजनक चीजों का पता चला।”
उन्होंने कहा, “उदाहरण के तौर पर सिक्किम की महिलाओं ने कहा कि यह पहला मौका था, जब उनके अपने राज्य में लैंगिक मुद्दे पर किसी बैठक का आयोजन किया गया।”
इस संवाददाता के लिए यह बेहद आश्चर्यजनक था, इसलिए सिक्किम के मामलों में विशेषज्ञ एक वरिष्ठ पत्रकार से इस बारे में बात की गई। उन्होंने कहा कि अधिकतर काम महिलाएं ही करती हैं, इसलिए उन्हें भेदभाव महसूस नहीं होता। इसलिए लैंगिक मुद्दे पर चर्चा की जरूरत ही महसूस नहीं होती।
नेपरम ने कहा कि शोध कार्य से पता चला कि हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों की महिलाओं को धर्म, भाषा और जातीयता पर विभाजित किया गया है, लेकिन समाज में उन्हें जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, वे एक जैसी ही हैं।
शोधकर्ताओं ने अपने काम के दौरान ‘पूर्वोत्तर भारत महिला शांति सभा’ के दो संस्करणों का आयोजन भी किया, जिनमें पहला मार्च 2015 में इंफाल में और दूसरा इस साल अगस्त में गुवाहाटी में किया गया।
असम विधानसभा चुनाव के बाद गुवाहाटी में आयोजित दूसरे संस्करण में ‘भारत की केवल महिलाओं की राजनीतिक पार्टी’ के विचार पर विस्तार से चर्चा की गई।
नेपरम ने बताया कि महिला राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने दलगत भावना से ऊपर उठकर सम्मेलन में हिस्सा लिया और कहा कि वे “एक सजावट की वस्तु के रूप में इस्तेमाल किए जाने से थक गई हैं।”
उन्होंने कहा, “हमने इस किताब में भारत की केवल महिलाओं की पहली राजनीतिक पार्टी का खाका तैयार किया है।”
नागरिक समाज से तीन वर्षो में किए गए सभी विचार विमर्श के आधार पर किताब में भी भारत में महिलाओं, शांति और सुरक्षा पर एक राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपी) को शामिल किया गया है।
नेपरम ने कहा कि एनएपी की प्रतियां केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी, गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू और राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम को भेज दी गई हैं।
इस संबंध में 12 दिसंबर को राष्ट्रीय राजधानी में एक संसदीय परामर्शदात्री बैठक आयोजित की जाएगी।
नेपरम का मानना है कि हालांकि एनएपी को पूवरेत्तर भारत में किए गए शोध के आधार पर तैयार किया गया है, लेकिन इसकी सिफारिशों को पूरे भारत में लागू किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, “भारत की अनपढ़ आबादी में से दो-तिहाई महिलाएं और लड़कियां हैं।”
उन्होंने कहा, “हर 22 मिनट में एक महिला या लड़की के साथ दुष्कर्म होता है और हर साल करीब 10 लाख लड़कियों को मां के गर्भ में ही मार दिया जाता है।”
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