नई दिल्ली, 21 दिसम्बर (आईएएनएस)। 2जी मामले में फैसला सुनाते हुए यहां की एक विशेष अदालत ने कहा कि पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस आवंटन से संबंधित नीतिगत मुद्दे पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समक्ष ‘तथ्यों को गलत तरीके से पेश नहीं किया’ था।
नई दिल्ली, 21 दिसम्बर (आईएएनएस)। 2जी मामले में फैसला सुनाते हुए यहां की एक विशेष अदालत ने कहा कि पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस आवंटन से संबंधित नीतिगत मुद्दे पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समक्ष ‘तथ्यों को गलत तरीके से पेश नहीं किया’ था।
विशेष न्यायधीश ओ.पी सैनी ने कहा, “यह स्पष्ट है कि पूर्व प्रधानमंत्री को उनके ही कार्यालय द्वारा पूरा तथ्य नहीं दिया गया, इसलिए ए. राजा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”
अदालत ने अभियोजन पक्ष के उन आरोपों को गलत बताया जिसमें यह कहा गया था कि ए. राजा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तथ्यों की गलत जानकारी दी है और मनमोहन सिंह ने दूरसंचार विभाग के निर्णय की जानकारी देने वाले राजा के पत्र को पढ़ा है जिसमें नए लाइसेंस को जारी करने के लिए पत्र जारी करना और तत्काल रूप से इस मुद्दे को प्रधान सचिव के साथ बातचीत करना शामिल था।
न्यायालय ने कहा, “हालांकि, इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि क्या यह पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय(पीएमओ) द्वारा पढ़ा गया था या नहीं।”
न्यायालय ने कहा, “यह राजा नहीं थे, बल्कि (वरिष्ठ पीएमओ अधिकारी) पुलक चटर्जी, उस समय के प्रधान सचिव टी.के.ए. नायर के संपर्क में थे, जिन्होंने राजा के पत्र के अत्यधिक प्रासंगिक व विवादस्पद भाग को तत्कालीन प्रधानमंत्री को नहीं बताया।”
राजा ने 2 नंवबर 2007 को लिखे पत्र में, प्रधानमंत्री को विशेष रूप से अपर्याप्त स्पेक्ट्रम की पृष्ठभूमि के आधार पर बड़ी संख्या में मिलने वाले पत्र, 2जी स्पेक्ट्रम की उपलब्धता के बारे में उल्लेख किया था जिसमें ट्राइ व दूरसंचार आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त स्पेक्ट्रम के आवंटन को सूचीबद्ध तरीके से रिकार्ड करने के बारे में बताया था।
राजा द्वारा 26 दिसंबर 2007 को लिखे पत्र में, उन्होंने तत्कालीन विदेश मंत्री और सॉलिसटर जनरल ऑफ इंडिया से बातचीत के बारे में भी बताया था।
नए लाइसेंस जारी करने के संबंध में, राजा ने बताया था कि इसके लिए तीन स्तरीय प्रक्रिया है जिसमें एलओआई जारी करना, लाइसेंस जारी करना और वायरलेस लाइसेंस की अनुमति देना शामिल था।
इस पत्र को पीएमओ के तत्कालिक वरिष्ठ अधिकारी पुलक चटर्जी ने 31 दिसंबर 2007 को अवलोकन किया था और उसके बाद तत्कालीन प्रधान सचिव टी.के.ए. नायर ने इसे देखा था। नायर ने 7 जनवरी 2008 को इस पत्र पर हस्ताक्षर किए और उसके बाद प्रधानमंत्री को यह फाइल भेजी।
राजा के पत्र का अवलोकन करने के बाद अधिकारियों ने एक नोट लिखा, जिसमें उन्होंने स्पेक्ट्रम उपलब्धता के बारे में चर्चा किया लेकिन इसमें नए लाइसेंस के संबंध में चर्चा नहीं की गई।
अदालत ने यह पाया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री के अधिकारियों ने नोट में पूरे मुद्दे के कुछ भाग को ही दर्शाया जबकि ‘काफी महत्वपूर्ण और नए लाइसेंस के संबंध में विवादास्पद मुद्दे को दरकिनार कर दिया।’
अदालत ने कहा, “इससे भी ज्यादा नोट काफी लंबा और तकनीकी शब्दावली से भरा था।”
न्यायालय ने कहा, “यह राजा के पत्र से भी लंबा था। प्रधानमंत्री काफी व्यस्त रहते हैं। उन्हें कहां से पूरे नोट को पढ़ने का समय मिलेगा।”
न्यायालय ने अपना विचार देते हुए कहा कि फाइल में प्रधानमंत्री का नाम नहीं दिया जा सकता था।
न्यायालय के अनुसार, राजा ने बदले मापदंड के साथ न्याय किया, लेकिन इस महत्वपूर्ण मुद्दे को सही समय पर तत्कालीन प्रधानमंत्री के समक्ष नहीं पेश किया गया।
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