नई दिल्ली, 8 मार्च (आईएएनएस)। संसद के उच्च सदन राज्यसभा में मंगलवार को महिला सदस्यों ने दलगत आधार से परे हटकर विधायिका में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले विधेयक को पारित करने की जरूरत पर बल दिया।
वरिष्ठ सांसद और अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने कहा, “मुझे खुशी है कि राज्यसभा ने विधेयक पारित कर दिया है। मुझे उम्मीद है कि इस साल शायद लोकसभा में भी यह विधेयक पारित हो जाएगा।”
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर हर महिला सांसद को तीन मिनट बोलने का मौका दिया गया था।
नजमा ने कहा, “मैं मानती हूं कि जैसा कि प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कहा सभी महिला सदस्यों को बोलना चाहिए, लेकिन समय आ गया है कि पुरुष भी महिला सशक्तीकरण की बात करें।”
कांग्रेस सांसद और पूर्व महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने कहा, “16 लोकसभाओं के बाद भी केवल 12 प्रतिशत महिलाएं हैं।”
रेणुका ने महिलाओं को लेकर नजरिया बदलने की भी मांग की।
उन्होंने कहा, “हम यहां किसी के मनोरंजन के लिए नहीं आते, इसलिए आते हैं, क्योंकि संविधान ने हमें यह अधिकार दिया है।”
अन्नाद्रमुक की शशिकला पुष्पा ने सवाल उठाया कि संसद में केवल 12 प्रतिशत महिलाओं का होना क्या उनके साथ इंसाफ है।
उन्होंने कहा, “महिला सशक्तीकरण का सबसे प्रभावी उपाय केवल आर्थिक विकास नहीं है, बल्कि निर्णय लेने में उनकी भागीदारी है। संसद में केवल 12 प्रतिशत महिलाएं हैं। क्या यह लैंगिक समानता है? क्या यह सामाजिक समानता है?”
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अंबिका सोनी ने कहा, “मैने शून्यकाल का नोटिस दिया था, ताकि हम इस पर चर्चा कर सकें। हमें बताया गया था कि महिलाओं को बोलने के लिए तीन मिनट दिए जाएंगे। मैं बड़ी उम्मीद से आई थी, लेकिन बेहद निराशा से बात कर रही हूं।”
कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा ने महिला आरक्षण विधेयक पर मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाया।
शैलजा ने कहा, “शायद यह प्रतीकात्मक है कि हम इस पर चर्चा नहीं कर रहे। हमें उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री आरक्षण के मुद्दे पर बात करेंगे।”
राज्य विधानसभाओं और संसद में महिलाओं को दो-तिहाई आरक्षण देने के लिए संविधान में संशोषण का एक विधेयक कुछ क्षेत्रीय पार्टियों के विरोध के बावजूद मार्च 2010 में राज्यसभा में पारित हो गया था। लेकिन, यह लोकसभा में आज तक पारित नहीं हो सका और इस पर कानून नहीं बन पाया।
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