भोपाल, 31 जनवरी (आईएएनएस)। देश में सरकारें रेल सेवा में सुधार और बदलाव के बीच सामाजिक सरोकार को भूलती नजर आने लगी हैं, यही कारण है कि यह सेवा महज कमाई का जरिया बनती जा रही है। बीते कुछ वर्षो में बदलाव की आड़ में किए गए प्रयोगों से रेल सेवा में खास व आम की यात्रा का अंतर साफ नजर आने लगा है। ‘प्रीमियम और सुविधा’ गाड़ियां यही कुछ जाहिर करती हैं।
भोपाल, 31 जनवरी (आईएएनएस)। देश में सरकारें रेल सेवा में सुधार और बदलाव के बीच सामाजिक सरोकार को भूलती नजर आने लगी हैं, यही कारण है कि यह सेवा महज कमाई का जरिया बनती जा रही है। बीते कुछ वर्षो में बदलाव की आड़ में किए गए प्रयोगों से रेल सेवा में खास व आम की यात्रा का अंतर साफ नजर आने लगा है। ‘प्रीमियम और सुविधा’ गाड़ियां यही कुछ जाहिर करती हैं।
प्रीमियम और सुविधा गाड़ियों का किराया मांग के आधार (डायनामिक फेयर) पर तय होता है। इस सुविधा के जरिए रेलवे ने यात्रियों की जेब काटकर अपना खजाना खूब भरा है।
रेलवे ने बीते वर्षो में अपनी आय बढ़ाने के लिए प्रीमियम और सुविधा ट्रेनों की शुरुआत की, ये ऐसी गाड़ियां हैं, जिनका किराया मांग के आधार पर तय होता है। मतलब यह कि जो यात्री ज्यादा किराया देगा, उसे गाड़ी में यात्रा सुविधा मिल पाएगी। इन गाड़ियों के चलते रेलवे की आमदनी में बड़ा इजाफा हुआ है। यह खुलासा सूचना के अधिकार के तहत सामने आई जानकारी से हुआ है।
मध्यप्रदेश के नीमच जिले के सूचना के अधिकार कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने प्रीमियम और सुविधा गाड़ियों से होने वाले लाभ का ब्यौरा मांगा तो पता चला कि प्रीमियम ट्रेन की आमदनी वर्ष 2012-13 में 10 करोड़ 96 लाख रुपये थी, जो वर्ष 2014-15 में बढ़कर 317 करोड़ रुपये (31 गुना) हो गई। वहीं वर्ष 2015-16 में 236 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की।
गौड़ बताते हैं कि ये ऐसी गाड़ियां हैं, जिनमें बुजुर्ग सहित अन्य वर्गो को कोई रियायत नहीं मिलती है, वहीं बच्चों से पूरा किराया वसूला जाता है। ये ऐसी गाड़ियां हैं, जिनमें सिर्फ संपन्न लोग ही यात्रा कर पाते हैं। वहीं आदमी मजबूरी में ही इन गाड़ियों में ज्यादा रकम देकर यात्रा कर पाता है।
प्रीमियम और सुविधा ट्रेन में सामान्यत: सामान्य श्रेणी का कोई डिब्बा ही नहीं होता, विकलांग व महिलाओं का भी कोई डिब्बा नहीं होता। लिहाजा, सामान्य टिकटधारी इससे यात्रा नहीं कर पाता है। सरकारें बात तो गरीब की करती हैं, मगर हकीकत यह है कि बदलाव और कमाई की आड़ में सरकार आम आदमी से रेल को दूर कर रही है।
केंद्रीय रेल सूचना प्रणाली (क्रिस) द्वारा गौड़ को दी गई जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2012-13 में जहां तीन लाख आठ हजार से अधिक यात्रियों ने इन गाड़ियों में यात्रा की, वहीं 2014-15 में यह संख्या बढ़कर 19 लाख 68 हजार से ज्यादा हो गई। वर्ष 2015-16 में 13 लाख 13 हजार यात्रियों ने यात्रा की।
गौड़ ने आईएएनएस से कहा कि सरकार का प्रीमियम और सुविधा ट्रेन में डायनामिक फेयर प्रणाली को लागू करना ‘व्यापारिक सोच’ को जाहिर करता है, लिहाजा सरकार को इस किराया प्रणाली पर फिर से विचार करके इन गाड़ियों में साधारण और महिलाओं व विकलांग के लिए डिब्बे लगाकर ‘जन हितैषी सोच’ का परिचय देना चाहिए। नए बजट में ‘प्रभु’ से यही अपेक्षा है।
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