राधेमोहन ने आरोप लगाया कि उनके पैतृक गांव में सेना भर्ती होना केंद्रीय मंत्री सिन्हा को गंवारा नहीं हुआ। इसलिए भर्ती स्थल बदलवाना पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है और इसका विपरीत परिणाम उन्हें भावी चुनाव में देखने को मिलेगा।
पूर्व सांसद ने कहा कि बतौर सांसद उन्होंने काफी मशक्कत के बाद गाजीपुर जनपद में सेना भर्ती शुरू कराई थी। वर्ष 2011 में बसपा के शासनकाल में उन्होंने पहली बार भर्ती के लिए प्रयास शुरू किया था। जनपद में पहली सेना भर्ती उसी समय हो गई होती, लेकिन जिला प्रशासन की अनुमति न मिलने के कारण भर्ती नहीं हो पाई।
राधेमोहन ने कहा कि उनके काफी प्रयासों के बाद पहली भर्ती 2013 में जिला मुख्यालय पर हुई थी। सेना भर्ती के लिए सैन्य अधिकारियों को गाजीपुर का माहौल भर्ती के अनुरूप लगा, जिस कारण उसी वर्ष दोबारा भर्ती आयोजित हुई। वर्ष 2014 में भी जनपद में सेना भर्ती आयोजित हुई, लेकिन इसके बाद क्या दिक्कत आई कि भर्ती का आयोजन वाराणसी में किया जाना तय हुआ।
पूर्व सांसद ने कहा कि चौथी बार उनके सांसद न रहते हुए भी जनपद के युवाओं के उज्ज्वल भविष्य के लिए सेना के उच्चाधिकारियों से भर्ती के बाबत उन्होंने वार्ता की थी। उच्चाधिकारियों ने करमपुर स्टेडियम को दौड़ के लिए चुना भी था।
पूर्व सांसद ने कहा कि कई बार सेना के कर्नल, मेजर व जिला प्रशासन ने मैदान का निरीक्षण किया गया और इसके बाद भर्ती के लिए हरी झंडी दे दी गई। इसके लिए 6 जनवरी से 17 जनवरी तक की तिथि भी मुकर्रर कर दी गई थी, लेकिन अंतिम क्षणों में भर्ती को एक फरवरी तक के लिए टाल दिया गया। सैनिक अधिकारियों ने तिथि परिवर्तन का कारण अनुमान से कम अभ्यर्थियों का नामांकन होना बताया।
उन्होंने बताया कि उन्हें छह जनवरी को जानकारी मिली कि भर्ती स्थल करमपुर से बदलकर वाराणसी कर दिया गया है। इसके पीछे रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा का हाथ है।
राधेमोहन ने कहा, “सिन्हा नहीं चाहते थे कि मेरे प्रयासों की बदौलत मेरे गांव में शुरू हुई सेना भर्ती हर साल यूं ही चलती रहे।”
उन्होंने यह भी कहा कि भर्ती स्थल स्थानांतरित कर अगर जिला मुख्यालय किया जाता तो इसमें सीधे-सीधे मंत्री की भूमिका स्पष्ट हो जाती। इसलिए राजनीति की बेहतरीन बिसात चलते हुए रेल राज्यमंत्री ने भर्ती स्थल वाराणसी करा दिया।”
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