सर्वप्रथम गिर्राज जी का महाभिषेक व आरती के बाद छप्पन भोग लगाया गया तथा मन्दिर के सभी भक्तवृंद द्वारा हरिनाम संकीर्तन हुआ।
इस दौरान प्रवचन में अपरिमेय श्यामदास ने बताया कि जब ब्रजवासी इंद्र की आराधना छोड़ गोर्वधन पर्वत (गिर्राज महाराज) की आराधना करने लगे तो वर्षा के देवता इंद्र ने क्रोध में आकर ब्रज पर भारी मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी तभी श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपने बायें हाथ की छोटी उगली पर धारण कर लिया।
सात दिनों तक वर्षा होती रही और भगवान गोवर्धन पर्वत को धारण किए रहे, तभी इंद्र को अपनी गलती का पश्चाताप हुआ और क्षमा मांगने के लिए भगवान की प्रिय सुरभि गाय के साथ भगवान के पास आए और क्षमा प्रार्थना की। कथा की समाप्ति के बाद गिर्राज महाराज जी तथा साथ में गौ माता की आरती व परिक्रमा की गई।
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