नई दिल्ली, 2 फरवरी (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों वाली एक संवैधानिक पीठ गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) नाज फाउंडेशन और अन्य की ओर से दाखिल उस विमोचक (क्यूरेटिव) याचिका पर सुनवाई करेगी, जिसमें उन्होंने समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित करने वाली आईपीसी की धारा 377 की वैधता पर पुनर्विचार की मांग की है।
सर्वोच्च न्यायालय की तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों की खंडपीठ में मुख्य न्यायाधीश न्यायामूर्ति टी.एस. ठाकुर की अगुआई में न्यायाधीश अनिल आर. दवे औ न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर शामिल थे। खंडपीठ ने विमोचक याचिका को पांच न्यायाधीशों वाली संवैधानिक पीठ को भेज दिया है। यह कदम वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की ओर से यह कहे जाने के बाद उठाया गया है कि इस मामले से दूरगामी संवैधानिक महत्व का सवाल जुड़ा हुआ है और इसलिए इसकी सुनवाई पांच न्यायाधीशों वाली पीठ को करनी चाहिए।
सिब्बल ने इस मामले पर कहा कि अदालत के सामने लाया गया यह मामला नितांत निजी अधिकार और लोगों के लिए बेहद जरूरी अधिकार- यौन संबधी अधिकार से जुड़ा है। आप अपने घर की चहारदीवारी के पीछे आपसी सहमति से यौनाचार कर रहे हैं तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
शीर्ष अदालत की 12 दिसंबर 2013 को दिए गए फैसले और 28 जनवरी 2014 को धारा 377 को कायम रखने के फैसले पर पुनर्विचार के लिए यह याचिका दायर की गई है। उन्होंने कहा कि यह याचिका समलैंगिक लोगों के अपमान और कलंक से जुड़ा है, जिस पर दो न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था।
अदालत में वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने आठ याचिकाकर्ताओं में से एक की तरफ से उपस्थित होते हुए धारा 377 पर पुनर्विचार की मांग की। इस पर मुख्य न्यायाधीश ठाकुर ने पूछा, “क्या यहां कोई है जो इसके खिलाफ है?”
इस पर अदालत को बताया गया कि एक संगठन को चर्च का प्रतिनिधि है, ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ अन्य व्यक्ति हैं जो इस पुनर्विचार याचिका के विरोध में हैं।
पीठ को बताया गया कि शीर्ष कोर्ट के 11 दिसंबर, 2013 के फैसले और पुनर्विचार याचिका पर फिर से गौर करने के लिए आठ सुधारात्मक याचिकाएं दायर की गई हैं। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड सहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय निरस्त कर दिया था।
इस मामले में 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने का फैसला दिया था, जिसे केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसने दिसंबर, 2013 में हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए समलैंगिकता को आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध बरकरार रखा। दो जजों की बेंच ने इस फैसले पर दाखिल पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी।
इसके बाद, 23 अप्रैल, 2014 को चार जजों- तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पी. सदाशिवम, न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा, न्यायमूर्ति एचएल दत्तू और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय – की बेंच ने क्यूरेटिव पिटीशन पर खुली अदालत में सुनवाई करने का फैसला दिया था, लेकिन अब ये चारों जज भी रिटायर हो चुके हैं।
हालांकि अदालत ने इस संबंध में सरकार को कोई नोटिस जारी नहीं किया और मामला बड़ी पीठ को सौंप दिया है।
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