नई दिल्ली, 21 अक्टूबर (आईएएनएस)। बदलती जीवनशैली एवं आनुवांशिक पूर्व-प्रवत्तियों के कारण आजकल युवाओं के सामने मधुमेह और बैड कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। ये बातें यहां एनसीडी प्री-डिजीज फोरम द्वारा आयोजित प्रोटेक्ट यंग इंडिया समिट में विशेषज्ञों ने कही। सम्मेलन में 200 से अधिक शोधकर्ता एवं डॉक्टर भाग ले रहे हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि 30 से 60 साल के युवाओं पर समयपूर्व कार्डियो-मेटाबॉलिक बीमारियों का यह भार एक बड़ी सामाजिक एवं आर्थिक चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है, जब हमें व्यापक आबादी पर मंडरा रहे इस खतरे पर केंद्रित हो जाना चाहिए, ताकि इस बीमारी की प्रारंभिक अवस्था या फिर इसकी सीमारेखा पर खड़े लोग बीमारी बढ़ने से पहले ही रोकथाम के उपाय कर सकें।
इस अध्ययन को दिल की बीमारी एवं डायबिटीज का खतरा कम करने के लिए खाने से प्राप्त बायोएक्टिव्स के सुरक्षित एवं प्रभावशील होने का मूल्यांकन करने के लिए देश में संचालित किया गया था।
डायबिटीज एवं दिल की बीमारी भारत में स्वास्थ्य की एक गंभीर समस्या है। उपचार के दिशानिर्देशों का नियम है कि इन बीमारियों के लिए दवाइयां केवल तभी दी जा सकती हैं, जब जांच में इन बीमारियों (मधुमेह या उच्च कोलेस्ट्रॉल) की पुष्टि हो जाए। इसका मतलब है कि जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा, जो इन बीमारियों की सीमारेखा पर है, यानी जिनके खून में सामान्य से अधिक चीनी या कोलेस्ट्रॉल है, और जो बीमारी की पूर्ववर्ती अवस्था में हैं, उनके लिए वर्तमान में रोकथाम का कोई भी इलाज संभव नहीं है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के पूर्व महानिदेशक और एनसीडी प्री-डिजीज फोरम, इंडिया के निदेशक प्रो. एन. के. गांगुली ने कहा, “हमें जीवनशैली और खान-पान में बदलाव करके ज्यादा जोखिम वालों में इन बीमारियों को बढ़ने से रोकना होगा। सरकार द्वारा नीतिगत बदलाव और जागरूकता अभियान तभी प्रभावशाली हो सकेंगे, जब लोग अपने खुद के स्वास्थ्य के लिए सकारात्मक कदम उठाएं।”
मेदांता-द मेडिसिटी के अध्यक्ष (प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी) डॉ. रवि कासलीवाल ने कहा, “मेदांता में हम हर दिन कई युवाओं को दिल के दौरे के साथ आते देखते हैं। यह न केवल उन व्यक्तियों के लिए दुख की बात है, बल्कि इससे परिवार एवं समाज पर भी बुरे प्रभाव पड़ते हैं।”
चेन्नई से सीनियर कंसल्टेंट, कॉर्डियोलॉजिस्ट एवं इस अध्ययन के एक परीक्षक, डॉ. अब्राहम ऊमैन ने बताया, “एसेंस डेटा के अनुसार ज्यादातर मरीज इन्वेस्टिगेशनल बायोएक्टिव के प्रयोग द्वारा अध्ययन के दौरान 100 मिग्रा/डीएल, एलडीएल-कोलेस्ट्रॉल का लक्ष्य हासिल करने में सफल रहे।”
उन्होंने आगे कहा, “अब इस बायोएक्टिव को यूरोपियन सोसायटी ऑफ कार्डियोलॉजी द्वारा कोलेस्ट्राल कम करने के लिए 2016 की क्लिनिकल प्रैक्टिस गाइडलाईन में शामिल किया गया है।”
इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्राइनोलॉजी एवं मेटाबॉलिज्म के कार्यकारी निदेशक डॉ. संजय कालरा ने कहा, “डायबिटीज की जगह हमें प्री-डायबिटीज की अवस्था पर केंद्रित होना चाहिए, जिसमें हमारे पास युवाओं के भविष्य का स्वास्थ्य सुनिश्चित करने का पूरा मौका होता है।”
उन्होंने आगे कहा, “असल में दिशानिर्देशों में साफ कहा गया है कि खून में अधिक चीनी वाले नए मरीजों में दवाई दिए जाने से पहले जीवनशैली में बदलाव और पोषक तत्वों द्वारा इलाज की कोशिश की जानी चाहिए।”
मुंबई के डॉ. हेमंत थैकर ने कहा, “हमें मरीज में बीमारी शुरू होने से पहले ही इलाज प्रारंभ कर देना चाहिए। लेकिन ऐसा करने के लिए बीमारीपूर्व की अवस्था की पहचान करना आवश्यक है।”
उन्होंने कहा, “हालांकि, इसका पूर्ण इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन कम से कम हम यह तो जान ही सकते हैं कि बीमारी होने से पूर्व की अवस्था में कब और किस समाधान के द्वारा हम उसे बढ़ने से रोक सकते हैं।”
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