कोलकाता, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। मॉलिबडेनम-99 की कमी को लेकर जारी वैश्विक चिंताओं के बीच, भारतीय वैज्ञानिक कैंसर का पता लगाने सहित परमाणु औषधियों से उपचार में प्रयोग होने वाले मुख्य रेडियोएक्टिव समस्थानिकों की कमी से निपटने में समक्ष हैं।
कोलकाता, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। मॉलिबडेनम-99 की कमी को लेकर जारी वैश्विक चिंताओं के बीच, भारतीय वैज्ञानिक कैंसर का पता लगाने सहित परमाणु औषधियों से उपचार में प्रयोग होने वाले मुख्य रेडियोएक्टिव समस्थानिकों की कमी से निपटने में समक्ष हैं।
कोलकाता के वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रोन सेंटर (वीईसीसी) के वैज्ञानिकों का दावा है कि भारत एनयूआरआईबी (एडवांस नेशनल फेसिलिीटी फॉर अनस्टेबलएंड रेयर इऑन बीम्स) में मॉलिबडेनम (संवर्णातु) 99 या मॉलि 99 के उत्पादन के लिए एक वैकल्पिक मार्ग का सहारा ले सकता है। आरआईबी (एएनयूआरआईबी रेडियोएक्टिव इयॉन बीम्स) पर शोध करने वाली भारत की दूसरी उन्नत फैकल्टी है।
मॉलि 99, टेक्निटियम-900एम का अनुगामी है। टेक्निटियम-900एम रेडियोएक्टिव समस्थानिक उपचार में बड़ी मात्रा में प्रयोग होता है क्योंकि इसमें गामा किरणों को प्रसारित करने की क्षमता है, जो इमेजिंग के जरिए कैंसर जैसी बीमारी के फैलाव पर नजर रखने में चिकित्सकों की मदद करता है।
यह परमाणु भट्टियों में बनता है और विश्व की मॉली 99 का उत्पादन करने वाली पांच परमाणु उत्पादन भट्टियों में सबसे बड़ी परमाणु भट्टी कनाडा की चाक रीवर नेशनल रिसर्च लेबोरेटरी भट्टी, 2018 में बंद होने वाली है।
वीईसीसी के निदेशक डी.के. श्रीवास्तव ने बताया, “चाक रीवर बंद होने के कारण आपूर्ति में कमी लगभग सन्निकट है। उत्पादन का वैकल्पिक मार्ग खोजना वरीयता है।”
श्रीवास्तव ने बताया कि कोलकाता के राजारहाट के पास स्थित एएनयूआरआईबी अगली-पीढ़ी की परमाणु शोध सुविधा है।
उन्होंने बताया, यहां तक कि एएनयूआरआईबी दुनिया के उन कुछ प्रतिष्ठानों में से एक होगा, जहां रेडियोएक्टिव इऑन किरणपुंज (आरआईबी) के साथ-साथ स्थायी समस्थानिक किरणपुंज (एसआईबी) उपलब्ध होंगे।
भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा वित्तपोषित, दो चरणों में नियोजित एएनयूअरआईबी के पूरे होने मे लगभग 900 करोड़ रुपये और 12 साल का समय लगेगा। यह 2019 में संचालन शुरू करेगा।
वीईसीसी के सहायक निदेशक (त्वरक) आलोक चक्रवर्ती ने बताया कि आरआईबी ब्रह्मांड को जानने का एक नया रास्ता है।
उन्होंने कहा, “यह सुविधा चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण समस्थानिकों की कमी से निपटने के भारत के प्रयासों को तेज करने और चिकित्सकीय परीक्षणों और उपचारों में उपयोगी संभावित नए समस्थानिकों पर शोध को प्रोत्साहित करेगी।”
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