नई दिल्ली, 18 मई (आईएएनएस)। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने देश की समग्र समृद्धि के लिए उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में रोजगार सृजन की अहमियत को रेखांकित किया।
पनगढ़िया ने नई दिल्ली में सोमवार को लांच की गई नीति आयोग की वेबसाइट पर प्रकाशित अपने प्रथम ब्लॉग पोस्ट पर लोगों के साथ अपने विचार साझा किए।
ब्लॉग में उन्होंने कहा कि इस तथ्य पर कोई असहमति नहीं हो सकती कि भारत में गरीबों को सबसे तेजी से राहत कृषिक्षेत्र में उत्पादकता बढ़ने से ही मिल पाएगी। कृषिक्षेत्र में ही तकरीबन आधा श्रम बल कार्यरत है। जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में कृषिक्षेत्र की हिस्सेदारी मौजूदा समय में तकरीबन 15 फीसदी है। इतना ही नहीं, यह आधा श्रम बल उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में कार्यरत अन्य आधे श्रम बल के मुकाबले कहीं ज्यादा गरीब भी है।
पनगढ़िया ने कहा कि हालांकि, आने वाले समय में भी आबादी के एक बड़े हिस्से को समृद्ध बनाने के लिहाज से कृषिक्षेत्र में निहित संभावनाएं काफी सीमित नजर आती हैं। अगर दीर्घकालिक अवधि पर गौर करें तो वर्ष 2011-12 से लेकर वर्ष 2013-14 तक की अवधिके दौरान मध्य प्रदेश के जो अनुभव रहे हैं वे दुर्लभ हैं, क्योंकि उस दौरान कृषिक्षेत्र की सालाना वृद्धि दर 20 फीसदी से भी ज्यादा रही थी।
उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में लगातार दस वर्षो तक राष्ट्रीय स्तर पर कृषिक्षेत्र की जो सर्वाधिक वृद्धि दर दर्ज की गई है, वह 5 फीसदी से कम है। दूसरे शब्दों में, जिन देशों में लंबे समय से विकास दर 6 फीसदी या उससे ज्यादा आंकी जा रही है, वहां उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों की वृद्धिदर कृषिक्षेत्र के मुकाबले कहीं ज्यादा रही है।
पनगढ़िया ने कहा कि इसी के मद्देनजर उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में अच्छी नौकरियों का सृजन अत्यंत जरूरी है। जब तक कर्मचारियों को इन क्षेत्रों में ज्यादा वेतन वाली नौकरियां हासिल करने का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक तेजी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था में निहित समृद्धि में वे अपनी पूर्ण हिस्सेदारी पाने में समर्थ नहीं हो सकेंगे। इसके उदाहरण सामने हैं।
उन्होंने कहा कि साठ एवं सत्तर के दशकों के दौरान दक्षिण कोरिया एवं ताइवान में हासिल समृद्धि में व्यापक हिस्सेदारी संभव हो पाई थी क्योंकि कृषिक्षेत्र के कामगारों के लिए उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में अच्छी नौकरियां पाना संभव था।
दक्षिण कोरिया में कुल रोजगारों में उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों की हिस्सेदारी वर्ष 1965 के 41.4 फीसदी से बढ़कर वर्ष 1980 में 66 फीसदी और वर्ष 1990 में इससे भी ज्यादा बढ़कर 81.7 फीसदी के उच्च स्तर पर पहुंच गया था। वहीं, कृषि क्षेत्र की इसमें हिस्सेदारी इसी अनुपात में घट गई थी। 60 एवं 70 के दशकों में ताइवान में भी ऐसा ही बदलाव देखने को मिला था। इसी तरह चीन में भी हाल के वर्षों में इसी तरह का बदलाव देखने को मिला है।
भारतीय किसान और उनके बच्चे इस तथ्य से वाकिफ हैं कि कहीं ज्यादा तेजी से विकसित होने वाले उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में उनके लिए काफी गुंजाइश है। गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘लोकनीति’ द्वारा हाल ही में कराए गए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि 62 फीसदी किसानों का यह कहना है कि उन्हें अगर शहर में नौकरी मिल जाए, तो वे खेती-बाड़ी छोड़ सकते हैं। जहां तक उनके बच्चों का सवाल है, उनमें से 76 फीसदी का कहना है कि वे खेती-बाड़ी को छोड़ किसी और पेशे को अपनाना पसंद करेंगे।
किसानों की इन्हीं आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए उत्पादकता बढ़ाने वाली चीजों जैसे सूक्ष्म सिंचाई, मृर्दा कार्डो, कारगर विस्तार सेवाओं एवं उन्नत बीजों में सार्वजनिक निवेश बढ़ाते वक्त सरकार ने उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान दिया है। ‘मेक इन इंडिया’ अभियान इस संदर्भ में सरकार के अनेक कदमों के लिए मददगार साबित हो रहा है।
उन्होंने कहा कि मीडिया में इस आशय की आशंका जताई जा रही है कि उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों के विस्तार से जमीनों का उपयोग कृषि के अलावा कहीं और होने लगेगा, जिससे खाद्य सुरक्षा की अनदेखी होगी। हालांकि, भूमि उपयोग के रुख से जुड़े कुछ खास तथ्यों को ध्यान में रखे बगैर इस तरह के विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। गैर-कृषि उपयोग के तहत आने वाला क्षेत्र वर्ष 2011-12 में महज 8 फीसदी था, जिनमें आवास, उद्योग, कार्यालय, सड़क, रेलवे और इसी तरह की अन्य चीजें शामिल हैं।
गैर-कृषि भूमि के उपयोग के मामले में ताजा आकड़े वर्ष 2011-12 तक के लिए ही उपलब्ध हैं। वहीं, 15 साल पहले वर्ष 1997-98 में यह अनुपात 7 फीसदी था। 15 वर्षो की इस अवधि के दौरान आर्थिक विकास की ज्यादा रफ्तार गैर-कृषि भूमि के उपयोग में एक फीसदी वृद्धि से ही संभव हो पाई, क्योंकि इसकी बदौलत प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है और गरीबी घटी है। यह उपलब्धि इससे पहले के 50 वर्षो की पूरी अवधि में भी हासिल नहीं हुई थी।
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