नई दिल्ली, 7 दिसम्बर (आईएएनएस)। दिल्ली उच्च न्यायालय बुधवार को उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें दिल्ली सरकार के सम-विषम नंबर वाली कारों को एक-एक दिन के अंतराल पर चलाने के निर्णय को चुनौती दी गई है।
अधिवक्ता आर.के. कपूर ने सोमवार को न्यायमूर्ति बी.डी. अहमद और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की खंडपीठ के समक्ष यह जनहित याचिका दायर की। इसमें कहा गया है कि सम-विषम नंबर वाले वाहन चलाने का निर्णय सभी कारकों पर समुचित विचार किए बिना लिया गया। इस पर अमल को रोका जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता की वकील श्वेता कपूर ने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या यह सार्वजनिक हित में है कि लोगों के निजी वाहनों, यानी निजी कारों पर बिना किसी समुचित अध्ययन के, नफा-नुकसान सोचे बगैर, बिना यह सोचे-समझे कि इसका लोगों पर क्या असर होगा, किसी तरह की रोक लगा दी जाए?
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) सरकार ने वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर को कम करने के लिए अगले साल पहली जनवरी से सम-विषम नंबर वाली निजी कारों को अलग-अलग दिन चलाने का फैसला लिया है। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय कुछ दिनों के लिए किया गया है और बाद में इसकी समीक्षा की जाएगी।
याचिका में कहा गया है कि सरकार ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक इच्छा का भी एक सिद्धांत होता है।
याचिका में महिला सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए कहा गया है कि महिलाओं को सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन मुहैया नहीं कराया गया है। दिन ढलने के बाद अपने कार्यस्थल से घर लौटने के लिए उनके पास अपने वाहन का ही सुरक्षित विकल्प होता है। जिस दिन उनकी कार का नंबर नहीं होगा, उस दिन वे क्या करेंगी। इसलिए यह फैसला अतार्किक और मनमाना है।
याचिका में विकलांगों का मुद्दा भी उठाया गया है। कहा गया है कि सार्वजनिक परिवहन में इनके लिए सफर की कोई गुंजाइश नहीं होती क्योंकि इनके लिए व्यवस्था ही नहीं की गई है।
याचिका में कहा गया है कि लोगों के संवैधानिक अधिकारों में कटौती से सिर्फ अफरातफरी बढ़ेगी। इससे प्रदूषण के वास्तविक कारणों पर असर नहीं पड़ेगा जो कि धूल, शहर में ट्रकों का आना और कचरा नष्ट करने के परंपरागत तरीकों में छिपे हुए हैं।
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