सरदार सरोवर बांध प्रभावित जनजातियों की संस्कृति पर खतरा

भोपाल, 16 दिसंबर (आईएएनएस)। सरदार सरोवर बांध से मध्यप्रदेश के डूब क्षेत्र में आए जनजातीय परिवारों को जमीन के बदले जमीन न मिलने से उनकी संस्कृति के विलुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। यह आशंका राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जताई है।

ज्ञात हो कि अनुसूचित जनजाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव ने 25 सितंबर से 28 सितंबर तक सरदार सरोबर बांध प्रभावित क्षेत्र-इंदौर, धार, अलीराजपुर और बड़वानी का दौरा किया था।

आयोग से विस्थापित अनुसूचित जनजाति परिवारों ने शिकायत की थी कि उन्हें भूमि के बदले भूमि नहीं दी गई, बल्कि मुआवजा राशि के रूप में साढ़े पांच लाख रुपये दिए गए हैं। इस पर आयोग का कहना है कि अनुसूचित जनजाति का हर त्योहार धरती व फसल से जुड़ा है। यदि उनके पास भूमि ही नहीं होगी तो उनकी संस्कृति नष्ट हो जाएगी। भूमि ही अनुसूचित जनजाति की पहचान है। उनके पास भूमि नहीं होने की स्थिति में भविष्य में आदिवासियों को जाति प्रमाण-पत्र पाने में भी दिक्कत होगी।

बांध प्रभावितों के पुनर्वास कार्यो में हुए भ्रष्टाचार की जांच के लिए उच्च न्यायालय ने साल 2008 में झा आयोग का गठन किया था। आयोग ने दिसंबर, 2015 में अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी थी, जिसमें में 1500 फर्जी रजिस्ट्री होने की बात कही गई है। इस तरह के काम में 186 दलालों के अलावा सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों की संलिप्तता भी पाई गई थी।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने सरकार को सलाह दी है कि उसे झा आयोग की अनुशंसाओं को लागू करना चाहिए, जिसमें खास तौर पर विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन देने व फर्जी सौदों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की बात कही गई है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने आगे कहा कि क्रेता, विक्रेता व दलाल के 999 प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय में विराचाराधीन हैं। इन प्रकरणों के अलावा ऐसे कई मामले हैं, जिनमें विस्थापित अनुसूचित जनजाति अपनी जमीन खो चुके हैं और मुआवजे के तौर पर जमीन भी नहीं मिली है। शासन की जिम्मेदारी है कि जमीन के सौदों से जुड़े दस्तावेजों की जांच करे। यदि अधिकारियों ने मुस्तैदी से अपनी जिम्मेदारी निभाई होती तो अशिक्षित अनुसूचित जनजाति अपनी जमीन से वंचित नहीं होते और न प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन होते।

पुनस्र्थापन से एक भी परिवार वंचित नहीं होने के राज्य सरकार के दावे पर भी आयोग ने सवाल खड़े किए हैं। आयोग का कहना है कि आयोग को अपने दौरे के दौरान यह पता चला कि सैकड़ों परिवार पुनस्र्थापित होने से वंचित हैं। ऐसे में सरकार द्वारा पुनस्र्थापन के मामले में ‘जीरो बैलेंस’ कैसे दिखाया गया?

ज्ञात हो कि नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध की जद में मध्यप्रदेश के अलावा महाराष्ट्र और गुजरात के क्षेत्र भी आए हैं। आयोग ने माना है कि विस्थापितों के लिए यहां से बेहतर काम महाराष्ट्र और गुजरात में हुए हैं।

नर्मदा बचाओ आंदेालन के मुताबिक, राज्य में सरदार सरोवर बांध परियोजना से 192 गांव और एक नगर डूब क्षेत्र में आए हैं। आयोग ने विभिन्न दस्तावेजों के जरिए पाया है कि 48 हजार परिवारों का अभी पुनर्वास होना बाकी है।

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