पटना, 8 फरवरी (आईएएनएस)। पटना पुस्तक मेले में बुधवार को साहिर लुधियानवी पर समर्पित पुस्तक ‘साहिर समग्र’ पर चर्चा की गई। संपादक आशा प्रभात ने साहिर की रचनाओं का पाठ किया, उनके लिखे फिल्मी गीतों की बात की, उसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।
पटना पुस्तक मेले में राजकमल प्रकाशन समूह के स्टाल पर आयोजित इस चर्चा में पुस्तक की सम्पादक आशा प्रभात के अलावा वरिष्ठ साहित्यकार मदन कश्यप, पाखी के सम्पादक और कथाकार प्रेम भारद्वाज, लेखक और पत्रकार अवधेश प्रीत शामिल थे।
आशा प्रभात ने कहा, “इस काम को अंजाम देने में ढाई साल लग गए। चूंकि साहिर ने खुद के निजी जीवन पर कहीं एक शब्द नहीं लिखा, इसलिए उनके परिचितों और मित्रों के संस्मरणों को खंगालने के अलावा दूसरा कोई तरीका नहीं था। इस दौरान पाकिस्तान और भारत के समकालीन कागजातों, पत्रिकाओं को खूब खंगाला, जिसका अनुभव बहुत रोचक था।”
प्रेम भारद्वाज ने कहा, “साहिर का नाम लेते ही अमृता प्रीतम याद आती हैं और अमृता प्रीतम का नाम लेते ही साहिर लुधियानवी। साहिर के ही एक शेर ‘दुनिया के तजुर्बातों हवा की शक्ल में’ को पढ़ते हुए उनकी निजी जिन्दगी का पूरा फलसफा सामने आ जाता है।”
अवधेश प्रीत ने कहा, “दुनिया साहिर को उनके फिल्मी गीतों से जानती है, लेकिन मुझ जैसे चंद लोग उन्हें अमृता प्रीतम से मिली जानकारियों से जानते हैं।” उनके ही एक शेर ‘जो साज से निकली है वो धुन सबने सुनी है..’ की चर्चा करते हुए प्रीत ने इस शेर का सुन्दर पाठ भी दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया।
वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा, “आपने उर्दू और हिंदी के बीच सेतु का काम किया है। आज जब भी हम शैलेन्द्र की या साहिर जैसे शायरों की बात करते हैं, तो फिल्मों से बात शुरू होती है और उसी के आसपास खत्म भी हो जाती है। लेकिन ऐसा होना नहीं चाहिए, इनकी रचनाओं का संसार बहुत व्यापक और विस्तृत है।”
साहिर के साथ शमशेर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि बदलते समय के लेखन में लोकप्रियता और साथ में गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि शायरी में एक धार का रूप पकड़ चुकी तुकों की परम्परा से अलग हटकर नई परिभाषाओं को गढ़ने के लिए लेखन जगत में उन्हें हरदम याद करेंगे।
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