सुप्रीम कोर्ट ने गरीब कैदियों की जमानत राशि के भुगतान के लिए एसओपी में संशोधन किया है. नए आदेश के अनुसार, जिलाधिकारी या उनके द्वारा नामित व्यक्ति, प्राधिकरण के सचिव, पुलिस अधीक्षक, जेल के अधीक्षक/उपाधीक्षक और संबंधित जेल के प्रभारी न्यायाधीश की एक अधिकार प्राप्त समिति गठित होगी. प्राधिकरण का सचिव इस समिति की बैठकों का संयोजक होगा और समिति हर महीने के पहले और तीसरे सोमवार को बैठक करेगी, अगर ये अवकाश पर हों तो अगले कार्यदिवस पर आयोजित होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगर विचाराधीन कैदी को जमानत का आदेश मिलता है और सात दिनों के भीतर जेल से रिहाई नहीं होती, तो जेल अधिकारी प्राधिकरण के सचिव को सूचित करेंगे. प्राधिकरण सचिव यह सुनिश्चित करेंगे कि कैदी के बचत खाते में जमानत राशि मौजूद है या नहीं. अगर राशि नहीं है, तो पांच दिनों के भीतर प्राधिकरण को भुगतान के लिए अनुरोध भेजा जाएगा. इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) में एकीकरण लंबित रहने तक, अधिकार प्राप्त समिति प्राधिकरण की सिफारिश के आधार पर जमानत राशि जारी करेगी.
अगर समिति यह तय करती है कि विचाराधीन कैदी गरीब कैदियों को सहायता योजना के अंतर्गत पात्र है, तो उसे अधिकतम 50,000 रुपये तक की सहायता दी जा सकती है. यह राशि अदालत के पास सावधि जमा या अन्य निर्धारित माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यह प्रक्रिया समिति के निर्णय के पांच दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए. इसके अलावा, अगर जमानत राशि 50,000 रुपये से अधिक है, तो समिति अपने विवेक का प्रयोग करते हुए एक लाख रुपये तक भुगतान कर सकती है.
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