हरिद्वार, 19 अप्रैल (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड की देवनगरी हरिद्वार में देववाणी संस्कृत पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में पांच वर्ग में 170 शोध पत्र पढ़े गए। संगोष्ठी में वेद, साहित्य, दर्शन, आगम व व्याकरण वर्ग में शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
हरिद्वार, 19 अप्रैल (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड की देवनगरी हरिद्वार में देववाणी संस्कृत पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में पांच वर्ग में 170 शोध पत्र पढ़े गए। संगोष्ठी में वेद, साहित्य, दर्शन, आगम व व्याकरण वर्ग में शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के मृत्युंजय सभागार में हुए समापन सत्र में संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। विद्वजनों ने एकमत से स्वीकार किया कि संस्कृत के विकास के लिए देवसंस्कृति विवि में हुई संगोष्ठी से जो बिन्दु उभर कर आये हैं, उसके विकास में सबकी भागीदारी हो।
प्रतिभागियों ने वेदपाठ, विश्व शांति के लिए हुए दीपमहायज्ञ में भी रुचिपूर्वक भाग लिया। साथ ही प्र™ोश्वर महादेव मंदिर में देववाणी संस्कृत के विकास की कामना की।
समापन सत्र को सम्बोधित करते हुए प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि 97 प्रतिशत भाषाओं की जननी संस्कृत है। संस्कृत केवल भाषा ही नहीं है, वरन यह भारतीय संस्कृति की एक परिभाषा है। संस्कृत के बढ़ते उपयोग पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि नासा जैसे वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों के इंजीनियर कम्प्यूटर में भी संस्कृत का उपयोग करने लगे हैं। तो वहीं श्रीयंत्र में संस्कृत में ही लिखी जाती है।
डॉ पण्ड्या ने कहा कि स्किल डेवलपमेंट सहित विकास के हर पहलुओं के लिए आर्ष ग्रंथों में बहुत कुछ छिपा है। आवश्यकता केवल उसका अध्ययन करने व पालन करने की है।
समापन सत्र में प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए भाषा विभागाध्यक्ष प्रो राधेश्याम चतुर्वेदी ने बताया कि वैदिक साहित्य में राष्ट्रीय भावना, वेदों में स्त्रियों का महžव, कश्मीरी शैव दर्शन में परावाद, संस्कृत के काव्य शास्त्रीय ध्वनि सिद्धांतों का हिन्दी पर प्रभाव जैसे अनेक विषयों पर प्रतिभागियों ने अपने शोध प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम के अंत में सेमिनार में आर्ष ग्रंथों के विभिन्न पक्षों पर प्रस्तुत किये गये शोध पत्र को विश्व समुदाय के बीच पहुंचाने पर बल दिया गया।
dharmpath.com dharmpath